मंगलवार, 18 अगस्त 2009

Kichen Tips

१.सख्त नींबू को अगर गरम पानी में कुछ देर के लिए रख दिया जाये तो उसमें से आसानी से अधिक रस निकाला जा सकता है।

२.महीने में एक बार मिक्सर और ग्राइंडर में नमक डालकर चला दिया जाये तो उसके ब्लेड तेज हो जाते हैं।

३.नूडल्स उबालने के बाद अगर उसमें ठंडा पानी डाल दिया जाये तो वह आपस में चिपकेंगे नही।

४.पनीर को ब्लोटिंग पेपर में लपेटकर फ्रिज में रखने से यह अधिक देर तक ताजा रहेगा।

५.मेथी की कड़वाहट हटाने के लिये थोड़ा सा नमक डालकर उसे थोड़ी देर के लिये अलग रख दें।

६.एक टीस्पून शक्कर को भूरा होने तक गरम करे। केक के मिश्रण में इस शक्कर को मिला दे। ऐसा करने पर केक का रंग अच्छा आयेगा।

७.फूलगोभी पकाने पर उसका रंग चला जाता है। ऐसा न हो इसके लिए फूलगोभी की सब्जी में एक टीस्पून दूध अथवा सिरका डाले। आप देखेगी कि फूलगोभी का वास्तविक रंग बरकरार है।

८.आलू के पराठे बनाते समय आलू के मिश्रण में थोड़ी सी कसूरी मेथी डालना न भूले। पराठे इतने स्वादिष्ट होंगे कि हर कोई ज्यादा खाना चाहेगा।

९.आटा गूंधते समय पानी के साथ थोड़ा सा दूध मिलाये। इससे रोटी और पराठे का स्वाद बदल जाएगा।

१०.दाल पकाते समय एक चुटकी पिसी हल्दी और मूंगफली के तेल की कुछ बूंदे डाले। इससे दाल जल्दी पक जायेगी और उसका स्वाद भी बेहतर होगा।

११.बादाम को अगर 15-20 मिनट के लिए गरम पानी में भिगो दें तो उसका छिलका आसानी से उतर जायेगा।

१२.चीनी के डिब्बे में 5-6 लौंग डाल दी जाये तो उसमें चींटिया नही आयेगी।

१३.बिस्कुट के डिब्बे में नीचे ब्लोटिंग पेपर बिछाकर अगर बिस्कुट रखे जाये तो वह जल्दी खराब नही होंगे।

१४.कटे हुए सेब पर नींबू का रस लगाने से सेब काला नही पड़ेगा।

१५.जली हुए त्वचा पर मैश किया हुआ केला लगाने से ठंडक मिलती है।

१६.मिर्च के डिब्बे में थोड़ी सी हींग डालने से मिर्च लम्बे समय तक खराब नही होती।

१७.किचन के कोनो में बोरिक पाउडर छिड़कने से कॉकरोच नही आयेंगे।

१८.लहसुन के छिलके को हल्का सा गरम करने से वो आसानी से उतर जाते हैं।

१९.हरी मिर्च के डंठल को तोड़कर मिर्च को अगर फ्रिज में रखा जाये तो मिर्च जल्दी खराब नही होती।

२०.हरी मटर को अधिक समय तक ताजा रखने के लिए प्लास्टिक की थैली में डालकर फ्रिजर में रख दें।
आनन्द लें इन टिप्स का और मुझे ज़रूर याद रखें ।

बादाम

1.  बादाम क्या होता है?
बादाम एक तरह का मेवा होता है। यह सबसे गुणवान मेवा में से है, और रोजाना इसको खाना चाहिये। आयुर्वेद में इसको बुद्धि और नसों के लिये गुणकारी बताया गया है। भारत में यह कशमीर का राज्य पेड़ माना जाता है।
2.  बादाम में क्या होता है?
बादाम से अनेक चीज प्राप्त होता है। यहां उसके बारे में बताया गया है।
23 बादाम = 1 मुठ्ठी बादाम = 1 आउंस बादाम = 28 ग्राम बादाम से मिलता है
कैलोरीज़ (calories) = 160, यह आपके शरीर को उर्जा प्रादान करता है। लेकिन बहुत अधिक खाने पर मोटापा भी दे सकता है।
¾ कैलोरीज इसमें फेट से मिलता है।
बाकिं कैलोरीज़, आपको कार्बोहाईड्रेट और प्रोटीन से मिलता है।
ग्लाईसेमिक लोड = 0 प्रतिदिन
कार्बोहाईड्रेट (Carbohydrate) बहुत कम होता है। इस कारण से बादाम से बना केक या बिस्कुट, वो लोग खा सकते हैं, जिन्हें चीनी खाना मना है, जैसे कि डायबिटीज़ के मरीज़।
प्रोटीन (Protein), यह शरीर में सार्वजनिक रूप से काम में आता है। यह आपके पेट को अधिक देर तक भर कर रखता है।
इसमें फेट इस प्रकार से है -
मोनो-अनसचुरेटेड फेटी असिड (Mono-unsaturated fatty acid) और पोली-अनसचुरेटेड फेटी असिड (Poly-unsaturated fatty acid), यह अच्छे तरह के चर्बी हैं, जो कि आपके शरीर में
कोलेस्टेरोल को कम करता है और दिल के बीमारी को भी दूर भगाता है।
ओमेगा – 3 (omega 3) फेटी एसिड अधिक होता है, जो कि लाभकारी होता है।
इसमें सचुरेटेड फेटी असिड (Saturated fatty acid) बहुत कम होता है। यह आपके दिल के लाभदायक है।
कोलेस्टेरोल नहीं होता है। यह आपके दिल के लाभदायक है।
फाईबर या रेशा (Fibre), यह आपके पाचन में सहायता करता है। साथ ही दिल के बीमारी को भी दूर भगाता है। यह आपके पेट को अधिक देर तक भर कर रखता है। इससे इसको वो लोग खा सकते हैं, जिन्हें कब्जियत (Constipation) का शिकायत रहता है।
सोडियम (Sodium) नहीं होता है, अर्थात इसको वो लोग खा सकते हैं, जिन्हें नमक खाना मना है, जैसे कि उच्च रक्तचाप (High blood pressure) के मरीज़।
पोटाशियम (Potassium), यह आपके शरीर के सेल (cell) को काम करने में सहायता करता है।
विटामिन ई (Vitamin E), यह आपके शरीर के सेल (cell) को सुरक्षा पहुंचाता है।
आयरन (Iron), यह आपके खून बनाने में सहायता करता है।
मेगनेसियम (Magnesium), यह आपके हड्डीयों को मजबूत बनाता है।
केलशियम (Calcium), यह आपके हड्डीयों को मजबूत बनाता है।
फोसफोरस (Phosphorus), यह आपके हड्डीयों को मजबूत बनाता है।
अल्कोहोल या मदिरा (alcohol), इसमें नहीं होता है। इस कारण से बच्चे भी इसको खा सकते हैं।
कैफीन या कोफी (caffeine, coffee), इसमें नहीं होता है। इस कारण से बच्चे भी इसको खा सकते हैं।
३ बादाम हर दिन खाना चाहिये। इसको आप अंदाज से नाप सकते हैं, जैसे कि -
1 मुठ्ठी
1 चौथाई कप
22 से 24 गिनती में
5.  बादाम हलवा
४ क्या रोज बादाम खाने से मोटापा होता है?
नहीं, अनेक रिसर्च से यह पता चला है कि, हर दिन उपर बताये गये संख्या में बादाम खाने से मोटापा नहीं होता है। साथ ही आप इस गुणकारी वस्तु को खाकर, आप अन्य चीज कम खाते हैं। यह आपके शरीर में अच्छे कोलेस्टेरोल को बढ़ाता है, और बुरे कोलेस्टेरोल को कम करता है।
5बादाम से क्या कोई बीमारी हो सकता है?
कच्चे बादाम खाने से टायफोयड हो सकता है। इस लिये हमेशा भुना हुआ, नमक के साथ या नमक के बिना, खाना चाहिये।
६ .  बादाम के तेल का क्या इस्तेमाल होता है?
बादाम का तेल, मालिश के लिये इस्तेमाल किया जाता है।

लाईफस्टायल मोडिफिकेशन

1.  “लाईफस्टायल मोडिफिकेशन” किसे कहते हैं?
दिल और नसों के बीमारीयों और अन्य बीमारीयों के होने के संभावना को कम करने के लिये अनेक उपाय हैं जो आप अपने जीवन में लागू कर सकते हैं। इसे “लाईफस्टायल मोडिफिकेशन” कहते हैं। इसमें आप जितना हो सके, अपने जीवन में आहिस्ता-आहिस्ता अपनाने का कोशिश करें। जितना अधिक आप इन बातों को अमल करेंगे, उतना कम आपको इन तरह के बीमारी होने का संभावना होगा।
अधिकतर समय हमारे समाज में यह होता है बचपन और जवानी को खाने-खेलने के लिये कहा गया है, और सामान्य रूप में खाने-खेलने के लिये को कोई रोक-टोक नहीं होता है। इसका मतलब है कि आप जितना चाहे, बटर लगा के परांठा, तले हुये और अधिक ग्रेवी वाले खाना, सोडा-कोल्ड-ड्रिंक्स, मिठाई, पिट्ज़ा, बरगर और अन्य अधिक कैलोरीज़ वाले खाना खाते हैं। उपर से आजकल के युग में, घर-बाहर में मोबाईल फोन और अनेक सुख-सुविधा होने से शारीरिक मेहनत कम हो गया है; बच्चे बाहर कम और कम्पुटर पर अधिक खेलते हैं; और सभी को अधिक स्ट्रेस रहता है। और उसके बाद पैंतीस-चालीस साल होते होते मोटापा, और पचासा होते होते हार्ट-अटैक और स्ट्रोक होने का जिक्र सुनने लगे हैं। फिर अचानक ही आपको यह चाहत होता है कि सबकुछ को “बटन” दबाकर “रिसेट” कर दें।
ये बातें केवल मरीजों के लिये नहीं है, बल्कि बचपन से सभी को इसका महत्व समझना चाहिये, और उस तरह का “लाईफस्टायल” अपनाना चाहिये। क्या जरूरत है कि पहले खिला-खिला कर मोटापा अर्जित करें, और फिर उसको लेकर ही हमेशा परेशान रहें? अधिक कैलोरीज़ वाले खाना, अपना दुर्प्रभाव बचपन से ही चालू कर देते हैं। दिल के नसों में तेल युक्त पदार्थ जमने लगते हैं, जिसे “प्लाक” कहते हैं, और यह आगे जाकर दिल का दौरा का कारण बन सकता है। भारत में पिछले दो दशक के विकास के कारण, बच्चों में मोटापा दिखने लगा है, क्योंकि बच्चों को अधिक कैलोरीज़ वाला खाना मिलता है, जिसे वो खेल-कूद कर खर्चा नहीं करते हैं। और इसी कारण से भारत में भी अब पश्चिमी देशों के जैसे बीमारी हर घर में दिखने लगा है।
2.  “लाईफस्टायल मोडिफिकेशन” से किन बीमारीयों से बच सकते हैं?
“लाईफस्टायल मोडिफिकेशन” से आप अपने को अनेक बीमारी से बचा सकते हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि आपको कोई बीमारी नहीं होगा। किंतु इससे आपको अनेक तरह के बीमारी होने के का संभावना कम हो जायेगा। कुछ बीमारी जिनका खतरा कम हो सकता है, वो हैं -
दिल का दौरा या हार्ट अटैक (Heart attack)
खून के नसों का बीमारी जैसे डी वी टी (DVT)
दिमाग में खून फैलना या ब्रैन हैमोरहेज या स्ट्रोक (stroke)
उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure)
कोलेस्टेरोल संबंधित समस्या (cholesterol related problems)
मोटापा संबंधित समस्या (obesity related problems)
डायबिटीज़ (Diabetes)
अन्य संबंधित समस्या (other related problems)
3.  “लाईफस्टायल मोडिफिकेशन” में क्या करना होता है?
इसमें, नीचे लिखे हुये सूची में से आप अनेक चीज कर सकते हैं। अधिक जानकारी के लिये संबंधित विषय देखें।
जरूरत से अधिक न खायें
खाना में तेल कम लें
खाना में चीनी कम लें
खाना में नमक कम लें
खाना में फाईबर अधिक लें
खाना में सब्जी अधिक लें
पौष्टिक खाना खायें
पार्याप्त विटामिन और मिनेरल्स खाया करें
रोजाना व्यायाम करें और अपने शरीर पर ध्यान दें
रोजाना शारीरिक मेहनत वाला काम करें
वजन को सामान्य स्तर में रखें, मोटापा खत्म करें

एनर्जी या उर्जा

1.  उर्जा किसको कहते हैं?
उर्जा शक्ति को कहते हैं, जो जीवन का आधार है। हर जीवित प्राणी, अर्थात मनुष्य, पेड-पौधे, पशु-पक्षी और जीवाणु-किटाणू को जीवित रहने के लिये उर्जा चाहिये होता है। मनुष्य इस उर्जा को खाने से प्राप्त करते हैं। हर खाद्य प्दार्थ को पचाकर, उसको उर्जा में परिवर्तित किया जाता है।
शरीर में यह उर्जा दो प्रकार से इस्तेमाल होता है; पहला सामान्य दैनिक जीवन के लिये और दूसरा कोई भी कार्य करने के लिये।
सामान्य दैनिक जीवन का मतलब है कि आप लेटे हुय हैं जैसे कि सोते समय या आप बैठे हैं और कोई काम नहीं कर रहे हैं, जैसे कि टीवी (Television) देखते समय। शरीर को इस स्थिर स्थिती में भी निरंतर उर्जा चाहिये होता है शरीर में अनगिनत काम को पूरा करने के लिये, जैसे कि सांस लेना, दिल का धडकना, खाना पचाना, खून का प्रावाहित होना इत्यादि।
इस पर से आप कुछ भी करते हैं, जैसे कि चलना, खेलना, घर या बाहर का काम करना, पढाई करना, कमप्युटर पर दिमाग लगाना, बोझ उठाना, बच्चे को खिलाना, बगान में काम करना या कोई भी अन्य तरह का मेहनत करना, उसके लिये आप अतिरिक्त उर्जा खर्च करते हैं। इसके अलावा बीमारी में, जैसे कि बुखार में, अधिक उर्जा खर्च हो सकता है।
उपर लिखे दो तरह के उर्जा खर्चा यह निश्चित करता है कि आपके शरीर को प्रतीदिन कितना उर्जा चाहिये या शरीर का उर्जा डिमांड (Energy Demand) क्या है?

2.  Energy Balance एनर्जी बैलेंस या उर्जा का समीकरण क्या होता है?
एनर्जी बैलेंस सभी रोग-निरोग और शांति-अशांति का केंद्र-बिंदु है। हर चीज के लिये उर्जा चाहिये होता है (एनर्जी डिमांड या Energy Demand), जिसे खाना के रूप में पूरा किया जाता है (एनर्जी सप्पलाई या Energy Supply)। तो इसमें तीन तरह कि बातें हो सकती हैं।
एनर्जी डिमांड के बराबर एनर्जी सप्पलाई है (Energy Demand = Energy Supply)। इसका मतलब है कि आप जितना उर्जा खाना से प्राप्त करते हैं, उतना उर्जा आपका शरीर सभी कर्यों में खर्चा करता है, और आपके शरीर पर कोई नया भार नहीं है। इससे आपका वजन समान (Constant Weight) रहेगा।
एनर्जी डिमांड से अधिक एनर्जी सप्पलाई है (Energy Demand < Energy Supply)। इसका मतलब है कि आप जितना उर्जा खाना से प्राप्त करते हैं, उतना उर्जा आपका शरीर सभी कर्यों में खर्च नहीं कर पाता है, और आपके शरीर पर अधिक उर्जा का भार है। शरीर अधिक उर्जा को फेट में बदल कर जमा कर लेता है। इससे आपका वजन अधिक होगा (Weight Gain), और आपको मोटापा और उससे संबंधित बीमारीयों का संभावना बढ जायेगा।
एनर्जी डिमांड के कम एनर्जी सप्पलाई है (Energy Demand > Energy Supply)। इसका मतलब है कि आप जितना उर्जा खाना से प्राप्त करते हैं, उतना उर्जा आपका शरीर के सभी कर्यों में खर्चा करने के लिये काफी नहीं है, और आपके शरीर पर कम उर्जा का भार है। शरीर उर्जा पूर्ती के लिये, पहले से जमा शरीर के फेट को खर्चा करता है। इससे आपका वजन घटेगा (Weight Loss), और आपका मोटापा भी घटेगा। दूसरे तरफ अगर आपको बुखार होता है, तो खाने के अरुचि से और अत्याधिक उर्जा खर्चा से वजन घट सकता है, जैसे कि तैपेदिक में वजन घटता है।

3.  मुझे वजन घटाने के लिये क्या करना चहिये?
दो तरह से आप वजन घटा सकते हैं, और यह दोनों तरीका साथ में अपनाना चहिये जिससे कि एनर्जी डिमांड के कम एनर्जी सप्पलाई हो सके (Energy Demand > Energy Supply)। पहला कि खाना कम खायें और दूसरा कि शारीरिक मेहनत करें। इसके बारे में इस साईट पर अनेक जगह बताया गया है।
4.  मुझे वजन बढाने के लिये क्या करना चाहिये?
यह उपर से विपरीत स्थिती है, और तभी उसका उल्टा करना होगा कि एनर्जी डिमांड से अधिक एनर्जी सप्पलाई हो सके (Energy Demand < Energy Supply)। इसका मतलब कि खाना अधिक खायें और हो सके तो शारीरिक मेहनत कम करें। इसके बारे में इस साईट पर अनेक जगह बताया गया है।

5.  उर्जा को कैसे नापा जाता है?
उर्जा को नापने के लिये अनेक तरीके हैं। यहां पर एनर्जी के कुछ युनिट के बारे में जिक्र किया जा रहा है। उर्जा के कुछ युनिट हैं – कैलोरीज (Calories), वाट्स (Watts), मेट्स (Mets)।
कैलोरी (Calorie) उर्जा का मुख्य युनिट है। बहुत कैलोरी को कैलोरीज़ (Calories) कहते हैं। इसमें 1 कैलोरी उतने उर्जा या एनर्जी को कहते हैं, जिससे 1 किलोग्राम पानी का तापमान, 1 डिग्री सेंटीग्रेड बढाया जा सके।
जूल्स (Joules) उर्जा का एक और युनिट। जैसे इंच और सेंटीमिटर, दूरी नापने के लिये दो तरह के युनिट हैं, जहां 1 इंच, 2.5 सेंटीमिटर के बराबर होता है। उसी तरह से उर्जा नापने के कैलोरीज और जूल्स हैं, जहां 1 कैलोरी, 4200 जूल्स के बराबर होता है। 1 कैलोरी को किलोकैलोरीज भी कहा जाता है, जहां कैलोरी को बडे “सी” से लिखा जाता है। 1 Calorie = 1 Kilocalories = 4200 Joules
वाट्स (Watts) = यह पावर का युनिट है, अर्थात आप कितना उर्जा प्रति सेकेंड खर्च कर सकते हैं या कितना उर्जा प्रति सेकेंड बना सकते हैं। इसमें 1 वाट, 1 जूल पर 1 सेकेंड के बराबर होता है। 1 Calorie/Second = 4200 Joules/Second = 4200 Watts
बी एम आर या बेसल मेटाबोलिक रेट (BMR or Basal Metabolic Rate) - यह बताता है कि आपका शरीर, संम्पूर्ण आराम के वक्त, कितना उर्जा खर्च करता है? कम से कम इतना उर्जा आपके शरीर को प्रतीदिन चाहिये होता है। यह हर व्यक्ति के लिये अलग होता है, जो कि उसके कद, काया, वजन, उम्र, लिंग, सेहत और अन्य बातों पर निर्भर करता है। अपना बी एम आर निकालने के लिये
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मेट्स या मेटाबोलिक इक्विवेलेंट (Mets or Metabolic Equivalent) - यह बताता है कि आपका शरीर, काम के वक्त, कितना उर्जा खर्च करता है? यह आपके बी एम आर के अनुपात में होता है। जैसे कि अगर आप तेजी से 1 घंटे चलते हैं, और आप करीब अपने बी एम आर से तीन गुणा अधिक उर्जा खर्च करते हैं, तो उसे तीन मेट्स कहते हैं। रिसर्च के द्वारा अनेक खेल-कूद और सामान्य घरेलू कार्य के लिये मट्स का अनुमान निकाला गया है। अंत में, जितना अधिक मेट्स होगा, उतना अधिक वो मेहनत का काम होगा। आपके सेहत के लिये, आप बिना परेशानी के, जितना अधिक मेट्स करने के काबिल होंगे, उतना ही आपका सेहत अच्छा होगा। इसके बारे में अधिक जानने के लिये
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फाईबर

1.  फाईबर क्या होता है?
फाईबर खाना में उपलब्ध रेशा को कहते हैं। इसे आपका शरीर पचा नहीं सकता है, और यह आपके खून में नहीं जाता है। विभिन्न खाना में फाईबर, अलग-अलग मात्रा में होता है। यह शरीर को कोई खराबी नहीं करता है, बल्कि यह आपके शरीर के लिये बहुत ही फायदेमंद होता है।
2.  फाईबर से क्या फायदा होता है?
सामान्य मात्रा में फाईबर खाने से आप अपने शरीर को अनेक बीमारी होने से बचा सकते हैं, जैसे कि दिल का बीमारी, डायबिटीज़ (टाईप 2), आंत में डायवर्टिकुलोसिस का बीमारी। इससे कब्जीयत नहीं होता है।
3.  फाईबर कितने प्रकार के होते हैं?
फाईबर दो प्रकार के होते हैं, एक जो कि पानी में घुल सकता है, और दूसरा कि पानी में घुल नहीं सकता है।
पानी में घुलनेवाला फाईबर, अंतडी़ में उपलब्ध, खाना द्वारा प्राप्त किया गया कोलेस्टेरोल को, पैखाने के रास्ते शरीर से बाहर निकाल देता है। इस प्रकार के फाईबर कुछ तरह के फल, सब्जी, बींस, और बारली में मिलता है।
पानी में न घुलनेवाला फाईबर आपके पाचन में मदद करता है, और सही तरह से पैखाना होने में मदद करता है। इससे आपको कब्जीयत नहीं होता है। इस तरह के फाईबर गेहूं, छिलका युक्त अनाज, और सब्जी में मिलता है।
4.  कितना फाईबर खाना चाहिये?
25 ग्राम फाईबर प्रतीदिन खाना चाहिये। अगर आप कम ले रहे हैं, तो खाने में बदलाव ला कर थोडा़-थोडा़ करके बढा़ सकते हैं। यह एक तरह का आपके लिये खाने में “
लाईफस्टायल मोडीफिकेशन

विटामिन इ

1.  विटामिन इ क्या करता है?
विटामिन इ, खून में रेड बल्ड सेल या लाल रक्त कोशिका (Red Blood Cell) को बनाने के काम आता है। यह विटामिन शरीर में अनेक अंगों को सामान्य रूप में बनाये रखने में मदद करता है जैसे कि मांस-पेशियां, अन्य टिशू। यह शरीर को ओक्सिजन के एक नुकसानदायक रूप से बचाता है, जिसे ओक्सिजन रेडिकल्स (oxygen radicals) कहते हैं। इस गुण को एंटीओक्सिडेंट (anti-oxidants) कहा जाता है। विटामिन इ, सेल के अस्तित्व बनाय रखने के लिये, उनके बाहरी कवच या सेल मेमब्रेन को बनाय रखता है। विटामिन इ, शरीर के फैटी एसिड को भी संतुलन में रखता है।
2.  विटामिन इ के अभाव से क्या होता है?
समय से पहले हुये या प्रीमेच्योर नवजात शिशु (Premature infants) में, विटामिन इ के कमी से खून में कमी हो जाता है। इससे उनमें एनिमीया (anemia) हो सकता है। बच्चों और व्यस्क लोगों में, विटामिन इ के अभाव से, दिमाग के नसों का या न्युरोलोजीकल (neurological) समस्या हो सकता है।
3.  बहुत अधिक विटामिन इ लेने से क्या हो सकता है?
अत्याधिक विटामिन इ लेने से खून के सेलों पर असर पर सकता है, जिससे कि खून बहना या बीमारी होना मुमकिन है।

विटामिन डी

1.  विटामिन डी के अन्य क्या नाम हैं?
विटामिन डी के अन्य नाम हैं –
विटामिन डी 2 या अर्गोकेलसीफेरोल (Vitamin D2 or Ergocalciferol)
विटामिन डी 3 या कोलेकेलसीफेरोल (Vitamin D3 or Cholecalciferol)
2.  विटामिन डी क्या करता है?
यह आपके शरीर के हड्डीयों को बनाने और संभाल कर रखने में मदद करता है। साथ ही यह शरीर में केलसियम (calcium) के स्तर को नियंत्रित रखता है।
3.  विटामिन डी के अभाव के क्या लक्षण हैं (signs of deficiency)?
इसके अभाव में हड्डी कमजोर होता है और टूट भी सकता है (फ्रेकचर या Fracture)। बच्चों में इस स्थिती को रिकेटस (Rickets) कहते हैं, और व्यस्क लोगों में हड्डी के मुलायम होने को ओस्टीयोमलेशिया (osteomalacia) कहते हैं। इसके अलावा, हड्डी के पतला और कमजोर होने को ओस्टीयोपोरोसिस कहते हैं।
4.  बहुत अधिक विटामिन डी खाने से क्या लक्षण हो सकते हैं (signs of toxicity)?
इससे शरीर के विभिन्न अंगों में, जैसे कि गुर्दे में, दिल में, खून के नसों में और अन्य जगह में, एक प्रकार का पथरी हो सकता है यह केलसियम (calcium) का बना होता है। इससे बल्ड प्रेशर या रक्तचाप बढ सकता है, खून में कोलेसटेरोल अधिक हो सकता है, और दिल पर असर पर सकता है। साथ ही चक्कर आना, कमजोरी लगना और सिरदर्द हो सकता है। पेट खराब होने से दस्त भी हो सकता है।
5.  विटामिन डी कैसे मिलता है?
विटामिन डी के अच्छे स्रोत हैं – अंडे का पीला भाग (egg yolk), मछली के तेल, विटामिन डी युक्त दूध और बटर में, और धूप सेकने से।

विटामिन सी

1.  विटामिन सी के अन्य क्या नाम हैं?
विटामिन सी के अन्य नाम हैं – एसकोरबिक ऐसिड (Ascorbic Acid)
2.  विटामिन सी क्या करता है?
यह आपके शरीर के सबसे छोटे इकाई या सेल (cell) को बांध के रखता है। इससे शरीर के विभिन्न अंग को आकार बनाने में मदद मिलता है। यह शरीर के बल्ड वेस्सल या खून के नसों (रक्त वाहिकाओं, blood vessel) को मजबूत बनाता है। इसके एंटीहिस्टामीन गुणवत्ता के कारण, यह सामान्य सर्दी-जुकाम में दवा का काम कर सकता है।
3.  विटामिन सी के अभाव के क्या लक्षण हैं (signs of deficiency)?
इसके अभाव में मसूडों से खून बहता है, दांत दर्द हो सकता है, दांद ढीले हो सकते हैं या निकल सकते हैं। स्किन या चर्म में भी चोट लगने पर अधिक खून बह सकता है, रुखरा हो सकता है। आपको भूख कम लगेगा। बहुत अधिक विटामिन के अभाव से स्कर्वी (scurvy) हो सकता है।
4.  बहुत अधिक विटामिन सी खाने से क्या लक्षण हो सकते हैं?
इससे शरीर के विभिन्न अंगों में, जैसे कि गुर्दे में, दिल में और अन्य जगह में, एक प्रकार का पथरी हो सकता है यह ओक्सलेट क्रिस्टल (oxalate crystal) का बना होता है। इससे पैशाब में जलन या दर्द हो सकता है, या फिर पेट खराब होने से दस्त हो सकता है। खून में कमी या एनिमीया (anemia) हो सकता है।
5.  विटामिन सी किससे मिलता है?
विटामिन सी के अच्छे स्रोत हैं – नारंगी जैसे फल या सिटरस फ्रूट्स, खरबूज

विटामिन सी

1.  विटामिन सी के अन्य क्या नाम हैं?
विटामिन सी के अन्य नाम हैं – एसकोरबिक ऐसिड (Ascorbic Acid)
2.  विटामिन सी क्या करता है?
यह आपके शरीर के सबसे छोटे इकाई या सेल (cell) को बांध के रखता है। इससे शरीर के विभिन्न अंग को आकार बनाने में मदद मिलता है। यह शरीर के बल्ड वेस्सल या खून के नसों (रक्त वाहिकाओं, blood vessel) को मजबूत बनाता है। इसके एंटीहिस्टामीन गुणवत्ता के कारण, यह सामान्य सर्दी-जुकाम में दवा का काम कर सकता है।
3.  विटामिन सी के अभाव के क्या लक्षण हैं (signs of deficiency)?
इसके अभाव में मसूडों से खून बहता है, दांत दर्द हो सकता है, दांद ढीले हो सकते हैं या निकल सकते हैं। स्किन या चर्म में भी चोट लगने पर अधिक खून बह सकता है, रुखरा हो सकता है। आपको भूख कम लगेगा। बहुत अधिक विटामिन के अभाव से स्कर्वी (scurvy) हो सकता है।
4.  बहुत अधिक विटामिन सी खाने से क्या लक्षण हो सकते हैं?
इससे शरीर के विभिन्न अंगों में, जैसे कि गुर्दे में, दिल में और अन्य जगह में, एक प्रकार का पथरी हो सकता है यह ओक्सलेट क्रिस्टल (oxalate crystal) का बना होता है। इससे पैशाब में जलन या दर्द हो सकता है, या फिर पेट खराब होने से दस्त हो सकता है। खून में कमी या एनिमीया (anemia) हो सकता है।
5.  विटामिन सी किससे मिलता है?
विटामिन सी के अच्छे स्रोत हैं – नारंगी जैसे फल या सिटरस फ्रूट्स, खरबूज

विटामिन ए

1.  विटामिन ए क्या करता है?
विटामिन आंखों से देखने दे लिये अत्यंत आवश्यक होता है। साथ ही यह बीमारी से बचने के काम आता है। यह विटामिन शरीर में अनेक अंगों को सामान्य रूप में बनाये रखने में मदद करता है जैसे कि स्किन, बाल, नाखून, ग्रंथि, दांत, मसूडा और हड्डी।
2.  विटामिन ए के अभाव से क्या होता है?
सबसे महत्वपूर्ण स्थिती जो कि सिर्फ विटामिन ए के अभाव में होता है, वह है अंधेरा में कम दिखाई देना, जिसे नाईट ब्लाइंडनेस (Night Blindness) कहते हैं। इसके साथ आंखों में आंसू के कमी से आंख सूख जाते हैं, और उसमें घाव भी हो सकता है। बच्चों में विटामिन ए के अभाव में विकास धीरे हो जाता है, जिससे कि उनके कद पर असर कर सकता है। स्किन और बालों में भी सूखापन हो जाता है और उनमें से चमक चला जाता है। संक्रमित बीमारी होने का संभावना बढ जाता है।
बहुत अधिक विटामिन ए लेने से क्या हो सकता है? अत्याधिक विटामिन ए लेने से शरीर पर अनेक दुर्प्रभाव हो सकते हैं जैसे कि सिरदर्द, देखने में दिक्कत, थकावट, दस्त, बाल गिरना, स्किन खराब हो जाना, हड्डी और जोडों में दर्द, कलेजा को नुकसान पहुंचना और लडकियों में असमय मासिक धर्म। गर्भ के दौरान खास सावधानी – अत्याधिक विटामिन ए, पेट में पलते बच्चे को नुकसान पहुंचा सकता है।
3.  विटामिन ए के लिये खाने के अच्छे स्रोत क्या हैं?
दूध और दूध से उतपादित खाद्य पदार्थ, हरी सब्जी, पीले सब्जी (शकरकंद, गाजर), पीले या नारंगी रंग के फल (नारंगी, आम), मीट (लिवर), कोर्नफ्लेकस या अन्य कृत्रिम खाद्य पदार्थ जिसमें निर्माता द्वारा अतिरिक्त विटामिन ए मिलाया गया हो।
4.  विटामिन ए को नापने के लिये क्या युनिट हैं?
विटामिन ए दो तरह के युनिट से नापा जाता है। इनको बदलने के लिये फोरमुला है -
1 IU = 1 International Unit = 0.3 microgram Retinol Equivalent
1 आई यु = 1 अंतरराष्ट्रीय युनिट = 0.3 माईक्रोग्राम रेटिनोल के बराबर
जहां 1 ग्राम = 1000 माईक्रोग्राम
5.  प्रतिदिन, कितना विटामिन ए खाना चाहिये?
विटामिन ए का “प्रतिदिन जरूरत” उम्र और सेहत के अनुसार बदलते रहता है।
जन्म से 6 महीने के उम्र के शिशु को करीब 1333 आइ यु या 400 माईक्रोग्राम
6 से 12 महीने के उम्र के शिशु को करीब 1666 आइ यु या 500 माईक्रोग्राम
1 से 3 साल के बच्चे को करीब 1000 आइ यु या 300 माईक्रोग्राम
4 से 8 साल के बच्चे को करीब 1333 आइ यु या 400 माईक्रोग्राम
9 से 13 साल के बच्चे को करीब 2000 आइ यु या 600 माईक्रोग्राम
14 से 30 साल के पुरुष को करीब 3000 आइ यु या 900 माईक्रोग्राम
14 से 30 साल के महिला को करीब 2333 आइ यु या 700 माईक्रोग्राम
गर्भ के दौरान करीब 2500 आइ यु या 750 माईक्रोग्राम
स्तनपान के दौरान करीब 4000 आइ यु या 1200 माईक्रोग्राम

सोमवार, 17 अगस्त 2009

चर्बी और तेल

1.  "कैसा" और "कितना" चर्बी और तेल खाना चाहिए?
चर्बी और तेल, शरीर में, एक बहुमूल्य पदार्थ हैं ये विभिन्न प्रकार के होते हैं आधिकांश समय, ये शरीर के लिए आवश्यक होते हैं, किंतु कुछ प्रकार के चर्बी और तेल, अधिक होने पर शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं तो चर्बी और तेल के लिए दो बातें महत्वपूर्ण हैं - "कैसा (Quality)" और "कितना (Quantity)" चर्बी और तेल खाना चाहिए?
रिसर्च के अनुसार "कितना" से अधिक "कैसा" चर्बी और तेल पर हमेशा ध्यान देना चाहिए, क्योंकि इनके विभिन्न प्रकार ग्रहण करने से आपका दिल के दौरे का संभावना बढ़ या घट सकता है
2.  चर्बी और तेल के कितने प्रकार होते हैं?
शरीर में अनेक तरह के चर्बी और तेल होते हैं सभी प्रकार के चर्बी और तेल हर व्यक्ति में होता है, किंतु कुछ लोग में कोई प्रकार अधिक होता है, तो किसी में कोई दूसरा प्रकार अधिक होता हैये विभिन्न प्रकार उनके बनावट पर निर्भर करता है
रसायन विद्या के अनुसार, सभी तेल और चर्बी, के एक छोटे कण या मोलेक्युल (molecule) को फेटी असिड कहते हैं हर कण में 3 धातु के अणु या ऎटम (atom), जैसे की कार्बन (Carbon, C), हाईड्रोजन (Hydrogen, H) और आक्सीजन (Oxygen, O) होते हैं कार्बन के अणु को जोड़ कर एक कड़ी बनता है, जिसे फेटी एसिड का कण या मोलेक्युल (molecule) कहते हैं
3.  "फेटी एसिड" का वर्गीकरण (classification)
"फेटी एसिड" को चार तरह से वर्गीकरण किया जा सकता है यह नीचे बताया गया है

पहला वर्गीकरण - "फेटी एसिड" चेन के लम्बाई के अनुसार -
2 से 7 कार्बन ऎटम वाले कड़ी को शोर्ट चेन फेटी एसिड (Short Chain Fatty Acid) कहते हैं
8 से 14 कार्बन ऎटम वाले कड़ी को मीडियम चेन फेटी एसिड (Medium Chain Fatty Acid) कहते हैं
15 से अधिक कार्बन ऎटम वाले कड़ी को लॉन्ग चेन फेटी एसिड (Long Chain Fatty Acid) कहते हैं

दूसरा वर्गीकरण - फेटी असिड चेन में कितने जोड़ उपस्थित हैं - हर चेन या कड़ी को बनने के लिए कार्बन ऎटम एक दूसरे से जुड़े होते हैं दो कार्बन ऎटम, एक दूसरे से कैसे जुड़े हैं, इसपर एक अन्य प्रकार से कड़ी का वर्गीकरण किया जा सकता है
अगर पूरे कड़ी में हर कार्बन ऎटम के बीच केवल एक जोड़ (single bond) है तो उसे संतृप्त या सचुरेटेड फेटी एसिड (saturated fatty acid, SFA) कहते हैं यह मुख्यतः जानवर से उत्पन होता है
अगर पूरे कड़ी में किसी दो कार्बन ऎटम के बीच दो जोड़ या जुड़वा जोड़ (double bond) है तो उसे असंतृप्त या अनसचुरेटेड फेटी एसिड (unsaturated fatty acid) कहते हैं यह मुख्यतः वनस्पति से उत्पन होता है यह फिर दो प्रकार में बांटा जा सकता है
अगर पूरे कड़ी में केवल दो कार्बन ऎटम के बीच जुड़वा जोड़ है तो उसे मोनोअनसचुरेटेड फेटी असिड (monounsaturated fatty acid, MUFA) कहते हैं
अगर पूरे कड़ी में, बहुत सारे जगह, दो कार्बन ऎटम के बीच जुड़वा जोड़ है तो उसे पोलीअनसचुरेटेड फेटी एसिड (polyunsaturated fatty acid, PUFA) कहते हैं
हम जो तेल या चर्बी खाते हैं, उनमें यह तीनों प्रकार के, सचुरेतेड, मोनोअनसचुरेटेड, पोलीअनसचुरेटेड, फेटी एसिड (saturated, monounsaturated and polyunsaturated fatty acid) होते हैं किंतु किसी तेल में कोई फेटी एसिड अधिक होता है, तो किसी में कोई और

तीसरा वर्गीकरण - फेटी एसिड चेन में किस कार्बन ऎटम पर जुड़वा जोड़ (डबल बोंड या Double bond) स्थित है? अगर तीसरे (ओमेगा-3, omega-3), छठे (ओमेगा-6, omega-6) या नौवें (ओमेगा-9, omega-9) स्थान पर स्थित कार्बन ऎटम पर यह जुड़वा जोड़ हुआ, तो उसे आवश्यक या एस्सेंसिअल फेटी एसिड (Essential fatty acid) कहते हैं

चौथा वर्गीकरण - फेटी एसिड चेन सीधा है या घूमा हुआ है यह फिर अनसचुरेतेड फेटी एसिड (unsaturated fatty acid) के लिए है
अगर किसी जुड़वा जोड़ पर फेटी एसिड चेन या कड़ी घूम जाता है, तो उसे सिस फेटी एसिड (Cis fatty acid) कहते हैं यह घुमावदार फेटी एसिड को एकजुट रखने में दिक्कत होता, अतः उसके भौतिक मूल्यों पर असर पड़ता है इस कारण ये अधिकतर तरल (liquid) रूप में पाये जाते हैं
अगर सभी जुड़वा जोड़ पर फेटी असिड चेन या कड़ी सीधा रहता है, तो उसे
ट्रांस फेटी एसिड (Trans fatty acid) कहते हैं ट्रांस फेटी एसिड क्रितिम होता है यह पोलीअनसचुरेतेड फेटी असिड में हाईड्रोजन (Hydrogen, H) के अणु मिलाने से होता है, जिसे हाईड्रोजनएशं (Hydrogenation) कहते हैं इस रूप में ट्रांस फेटी एसिड को कसके बांध कर रखा जा सकता है इसी पैकेजिंग से यह कमरे के साधारण तापमान पर भी ठोस (solid) रहता है उदाहरण के लिय डालडा (Dalda), जो की साधारण तापमान पर भी ठोस (solid) रहता है इससे उस तेल को संभाल कर रखने में कम खर्च आता है किंतु ट्रांस फेटी एसिड (Trans fatty acid) शरीर के लिए हानिकारक होता है

चीनी

1.  अधिक चीनी खाने से क्या होता है?
चीनी खाने से आपको दो चीज़ मिलता है – मिठास और उर्जा या कैलोरीज़। मिठास आपके मन के संतोष के लिये होता है, और उर्जा आपके तन के संतोष के लिये होता है। लेकिन, अगर आप जरूरत से ज्यादा चीनी खाते हैं, तो अतिरिक्त उर्जा या कैलोरीज़ आपके शरीर में फेट या चर्बी के रूप में जमा होकर आपका मोटापा बढाता है। इससे शरीर अनेक बीमारी को न्योता देता है, जैसे कि डायबिटीज़ और हृदय का रोग। इससे बचने के लिये जरूरत है कि आपको चीनी युक्त खाद्य पदार्थ पर नियंत्रण रखना चाहिये। इसके लिये पिछले कुछ दशकों में हजारों रिसर्च करके अनेक बनावटी चीनी का निर्माण किया गया है।
2.  आर्टिफिशियल शुगर या बनावटी चीनी क्या होता है?
बनावटी चीनी उस पदार्थ को कहते हैं जो चीनी के जैसा मीठा होता है, और चीनी से कम उर्जा या कैलोरीज़ प्रदान करता है। इससे आपके मन को मिठास खाने का संतोष भी मिलता है, और साथ ही शरीर को अत्याधिक कैलोरीज़ भी नहीं मिलता है।
3.  खाने में से उर्जा या कैलोरीज़ कैसे मिलता है?
शरीर खाना से मिले कारबोहाईड्रेट, प्रोटीन और फेट को अनेक काम में लगाता है। इसमें से कारबोहाईड्रेट, जैसे कि चावल या गेहूं का मुख्य अंश, को पचा कर उर्जा निकाला जाता है। साथ ही पानी और कार्बन डाईओक्साइड गेस का निर्माण होता है, जो कि शरीर से पेशाब या सांस के द्वारा निकाल दिया जाता है। यह उर्जा शरीर के संचालन में काम आता है। अतिरिक्त उर्जा या कैलोरीज़ आपके शरीर में फेट या चर्बी के रूप में जमा होकर आपका मोटापा बढाता है।
4.  खाने के गुण को कैसे महसूस किया जाता है?
जीभ पर खाने के गुण को महसूस को करने के लिये रिसेप्टर या इन्द्रिय बोधक होते हैं। इसमें खाने के तत्व किसी अतिविशेष रिसेप्टर के साथ जुडते हैं, जैसे कि कोई चाभी किसी विशेष ताले से जुडता है। इससे खाने का मिठास, नमकीन, खट्टा, कडवाहट इत्यादि के गुण को महसूस किया जाता है। यह बोध फिर नर्व्स या नसों द्वारा दिमाग के विशेष जगह पर भेजा जाता है। इससे आप समझते हैं कि आप मीठा, नमकीन, खट्टा, कडवाहट इत्यादि खा रहे हैं।
5.  क्या खाने के मिठास को सभी जानवर एक जैसा महसूस करते हैं?
खाने के मिठास को पहचानने के लिये जीभ पर रिसेप्टर या इन्द्रिय बोधक होते हैं। यह टी-1-आर-3 (T1R3, TAS1R3) के प्रकार के होते हैं, जो कि मनुष्य और बन्दर में पाया जाता है, किंतु चूहे में नहीं होता है। इसलिये जहां आपको चीनी मीठा लगता है, तो यह चीज चूहे को मीठा नहीं लगता है, क्योंकि उनमें यह रिसेप्टर ही नहीं होता है।
6.  विभिन्न खाने का मिठास क्यों अलग रहता है?
जहां खाने के मिठास को पहचाने के लिये खाने के तत्व और उसके विशेष रिसेप्टर को मिलना जरूरी है, सभी खाना एक रंग जैसा मीठा नहीं होता है। इसके लिये दो बातें होती हैं – कि खाने में मीठासकारक तत्व का क्या प्रकार है और वो कितना है।
मीठासकारक तत्व के प्रकार का मतलब है कि खाने में मिठास के कण और रिसेप्टर के बीच में कैसा रिश्ता है? जितना अधिक रिश्ता होगा, उतना अधिक कण और रिसेप्टर के बीच में बंधंन होगा। उल्टे, जितना कम रिश्ता होगा, उतना कम कण और रिसेप्टर के बीच में बंधंन होगा। उदाहरण के लिये केला, सेब से अधिक मीठा होता है, क्योंकि चीनी के विभिन्न कण के प्रकार अधिक होते हैं।
दूसरा बात होता है, कि उस कण का मात्रा क्या है? जितना अधिक मात्रा होगा, उतना अधिक कण और रिसेप्टर के बीच में बंधंन होगा। उल्टे, जितना कम मात्रा होगा, उतना कम कण और रिसेप्टर के बीच में बंधंन होगा। उदाहरण के लिये आप खीर बनाते हैं, लेकिन उसका मिठास हर बार एक समान नहीं रहता है। कभी अधिक मीठा होता है, तो कभी कम; और यह निर्भर करता है कि आपने उसमें कितना चीनी का मात्रा दिया है?
7.  आर्टिफिशियल शुगर या बनावटी चीनी कैसे काम करते हैं?
बनावटी चीनी में भी मिठास के कण होते हैं, जो कि सामान्य चीनी में पाये जानेवाले ग्लुकोज़ से अलग होते हैं। इन कणों के प्रकार और मात्रा के अनुसार मिठास का अनुभव होता है। ये कण बहुत कम उर्जा में परिवर्तित होते हैं, जिससे कि ये कोई खास कैलोरीज़ नहीं प्रदान करते हैं। विभिन्न प्रकार के उपर निर्धारित अनेक कृतिम चीनी बनाया गया है, जिसे आर्टिफिशियल शुगर या बनावटी चीनी कहा जाता है। कुछ प्राकृतिक रूप में भी चीनी के मिठास जैसे पदार्थ होते हैं, लेकिन उनसे उर्जा का भी प्राप्ति होता है, और उनको आर्टिफिशियल शुगर या बनावटी चीनी नहीं कहा जाता है।

चीनी

1.  अधिक चीनी खाने से क्या होता है?
चीनी खाने से आपको दो चीज़ मिलता है – मिठास और उर्जा या कैलोरीज़। मिठास आपके मन के संतोष के लिये होता है, और उर्जा आपके तन के संतोष के लिये होता है। लेकिन, अगर आप जरूरत से ज्यादा चीनी खाते हैं, तो अतिरिक्त उर्जा या कैलोरीज़ आपके शरीर में फेट या चर्बी के रूप में जमा होकर आपका मोटापा बढाता है। इससे शरीर अनेक बीमारी को न्योता देता है, जैसे कि डायबिटीज़ और हृदय का रोग। इससे बचने के लिये जरूरत है कि आपको चीनी युक्त खाद्य पदार्थ पर नियंत्रण रखना चाहिये। इसके लिये पिछले कुछ दशकों में हजारों रिसर्च करके अनेक बनावटी चीनी का निर्माण किया गया है।
2.  आर्टिफिशियल शुगर या बनावटी चीनी क्या होता है?
बनावटी चीनी उस पदार्थ को कहते हैं जो चीनी के जैसा मीठा होता है, और चीनी से कम उर्जा या कैलोरीज़ प्रदान करता है। इससे आपके मन को मिठास खाने का संतोष भी मिलता है, और साथ ही शरीर को अत्याधिक कैलोरीज़ भी नहीं मिलता है।
3.  खाने में से उर्जा या कैलोरीज़ कैसे मिलता है?
शरीर खाना से मिले कारबोहाईड्रेट, प्रोटीन और फेट को अनेक काम में लगाता है। इसमें से कारबोहाईड्रेट, जैसे कि चावल या गेहूं का मुख्य अंश, को पचा कर उर्जा निकाला जाता है। साथ ही पानी और कार्बन डाईओक्साइड गेस का निर्माण होता है, जो कि शरीर से पेशाब या सांस के द्वारा निकाल दिया जाता है। यह उर्जा शरीर के संचालन में काम आता है। अतिरिक्त उर्जा या कैलोरीज़ आपके शरीर में फेट या चर्बी के रूप में जमा होकर आपका मोटापा बढाता है।
4.  खाने के गुण को कैसे महसूस किया जाता है?
जीभ पर खाने के गुण को महसूस को करने के लिये रिसेप्टर या इन्द्रिय बोधक होते हैं। इसमें खाने के तत्व किसी अतिविशेष रिसेप्टर के साथ जुडते हैं, जैसे कि कोई चाभी किसी विशेष ताले से जुडता है। इससे खाने का मिठास, नमकीन, खट्टा, कडवाहट इत्यादि के गुण को महसूस किया जाता है। यह बोध फिर नर्व्स या नसों द्वारा दिमाग के विशेष जगह पर भेजा जाता है। इससे आप समझते हैं कि आप मीठा, नमकीन, खट्टा, कडवाहट इत्यादि खा रहे हैं।
5.  क्या खाने के मिठास को सभी जानवर एक जैसा महसूस करते हैं?
खाने के मिठास को पहचानने के लिये जीभ पर रिसेप्टर या इन्द्रिय बोधक होते हैं। यह टी-1-आर-3 (T1R3, TAS1R3) के प्रकार के होते हैं, जो कि मनुष्य और बन्दर में पाया जाता है, किंतु चूहे में नहीं होता है। इसलिये जहां आपको चीनी मीठा लगता है, तो यह चीज चूहे को मीठा नहीं लगता है, क्योंकि उनमें यह रिसेप्टर ही नहीं होता है।
6.  विभिन्न खाने का मिठास क्यों अलग रहता है?
जहां खाने के मिठास को पहचाने के लिये खाने के तत्व और उसके विशेष रिसेप्टर को मिलना जरूरी है, सभी खाना एक रंग जैसा मीठा नहीं होता है। इसके लिये दो बातें होती हैं – कि खाने में मीठासकारक तत्व का क्या प्रकार है और वो कितना है।
मीठासकारक तत्व के प्रकार का मतलब है कि खाने में मिठास के कण और रिसेप्टर के बीच में कैसा रिश्ता है? जितना अधिक रिश्ता होगा, उतना अधिक कण और रिसेप्टर के बीच में बंधंन होगा। उल्टे, जितना कम रिश्ता होगा, उतना कम कण और रिसेप्टर के बीच में बंधंन होगा। उदाहरण के लिये केला, सेब से अधिक मीठा होता है, क्योंकि चीनी के विभिन्न कण के प्रकार अधिक होते हैं।
दूसरा बात होता है, कि उस कण का मात्रा क्या है? जितना अधिक मात्रा होगा, उतना अधिक कण और रिसेप्टर के बीच में बंधंन होगा। उल्टे, जितना कम मात्रा होगा, उतना कम कण और रिसेप्टर के बीच में बंधंन होगा। उदाहरण के लिये आप खीर बनाते हैं, लेकिन उसका मिठास हर बार एक समान नहीं रहता है। कभी अधिक मीठा होता है, तो कभी कम; और यह निर्भर करता है कि आपने उसमें कितना चीनी का मात्रा दिया है?
7.  आर्टिफिशियल शुगर या बनावटी चीनी कैसे काम करते हैं?
बनावटी चीनी में भी मिठास के कण होते हैं, जो कि सामान्य चीनी में पाये जानेवाले ग्लुकोज़ से अलग होते हैं। इन कणों के प्रकार और मात्रा के अनुसार मिठास का अनुभव होता है। ये कण बहुत कम उर्जा में परिवर्तित होते हैं, जिससे कि ये कोई खास कैलोरीज़ नहीं प्रदान करते हैं। विभिन्न प्रकार के उपर निर्धारित अनेक कृतिम चीनी बनाया गया है, जिसे आर्टिफिशियल शुगर या बनावटी चीनी कहा जाता है। कुछ प्राकृतिक रूप में भी चीनी के मिठास जैसे पदार्थ होते हैं, लेकिन उनसे उर्जा का भी प्राप्ति होता है, और उनको आर्टिफिशियल शुगर या बनावटी चीनी नहीं कहा जाता है।

दूध में क्या होता है?

दूध में पानी, चीनी, प्रोटीन, फेट और अनेक अन्य सामग्री होता है। ये शरीर के लिये लाभदायक होते हैं।
लेक्टोज़ (lactose) क्या होता है?
लेक्टोज़, दूध में उपस्थित उपस्थित, एक प्रकार के चीनी को कहते हैं। यह एक तरह का कार्बोहाईड्रेट (carbohydrate) हुआ। इसको पचाने के लिये शरीर में एक विशेष एंज़ाईम का जरूरत होता है, जिसे “लेक्टेज़ एंज़ाईम (lactase enzyme)” कहते हैं। यह अंतड़ी के उपरी स्तर, जिसे “इंटेस्टाईनल म्युकोज़ा (intestinal mucosa)” कहते हैं, उसपर मौजूद होता है।
लेक्टोज़ इनटोलरेंस किसको कहते हैं?
लेक्टोज़, को पचाने में कठिनाई को लेक्टोज़ इनटोलरेंस कहते हैं। इसमें किसी कारण से अगर इंटेस्टाईनल म्युकोज़ा पर लेक्टेज़ एंज़ाईम का कमी हो जाता है, तो उसे लेक्टोज़ इनटोलरेंस कहते हैं।
लेक्टोज़ इनटोलरेंस किस स्थिती में हो सकता है?
लेक्टोज़ इनटोलरेंस, लेक्टेज़ एंज़ाईम के कमी से होता है। यह नीचे लिखे हुये स्थिती में हो सकता है।
उम्र के साथ लेक्टेज़ एंज़ाईम में कमी। यह बड़े लोगों में होता है, जो खास करके दूध-दही कम खाते हैं, और पाश्चात्य खाना अधिक खाते हैं। उनके शरीर में लेक्टेज़ एंज़ाईम बनना कम हो जाता है। यह अंदाज किया जाता है कि भारत में, एक चौथाई से आधे लोगों में लेक्टेज़ एंज़ाईम का कमी हो जाता है। कभी कभार ये बच्चों में भी पाया जाता है। इसको प्राईमरी लेक्टोज़ इनटोलरेंस (Primary lactose intolerance) कहते हैं।
अगर किसी बीमारी से इंटेस्टाईनल म्युकोज़ा को नुकसान पहुंचता है, जिससे कि लेक्टेज़ एंज़ाईम का कमी हो जाता है। यह क्षणिक हो सकता है, जैसे कि कोई खराब खाना से पेट खराब होना और दस्त लगना (diarrhea)। उदाहरण के लिये पेट में रोटा वायरस (rota virus), या फिर पेट में कीड़ा जैसे कि जीयारडिया (giardia) होने से कुछ समय के लिये लेक्टेज़ एंज़ाईम का कमी हो जाता है। अथवा, यह लंबे समय तक चल सकता है, जैसे कि कोई अंतड़ी का बीमारी, जैसे कि सिलियेक डिसीज़ (celiac disease), क्रोंस डिसीज़ (crohn’s disease) । कुछ नवजात शिशु को, उनके लेक्टेज़ एंज़ाईम के पाचन शक्ति से बहुत अधिक दूध पिलाने से, कुछ समय के लिये लेक्टेज़ एंज़ाईम का कमी हो जाता है। इन सभी तरह के परिस्थिति के लेक्टेज़ एंज़ाईम के कमी को सेकंडरी लेक्टोज़ इनटोलरेंस (Secondary lactose intolerance) कहते हैं।
कुछ नवजात शिशु को जन्म से ही लेक्टेज़ एंज़ाईम का कमी होता है, जिसे कि कंजेनिटल लेक्टेज़ डेफिसियेंसी (congenital lactase deficiency) कहते हैं।
कुछ शिशु समय से पहले पैदा होते हैं, जिन्हें प्रिमेच्योर बेबी (premature baby) कहते हैं। गर्भ के आखिरी महीनों में इंटेस्टाईनल म्युकोज़ा में लेक्टेज़ एंज़ाईम बनता है। समय से पहले पैदा होने पर, इस लेक्टेज़ एंज़ाईम से वो वंचित रह जाते हैं। लेकिन यह कुछ महीनों में ठीक हो सकता है।
कुछ देश के लोग, जैसे कि चाईना (china) के लोग, को जेनेटिक्स के कारण लेक्टोज़ इनटोलरेंस होता है।
लेक्टोज़ इनटोलरेंस में क्या लक्षण (symptoms) होता है?
लेक्टोज़ इनटोलरेंस, में कोई भी दूध पीने से हाजमा खराब हो जाता है। इसमें पेट भरा लगता है, पेट दर्द देता है, पेट फूला लगता है, हवा निकलता है और उल्टी लगता है।
लेक्टोज़ इनटोलरेंस में क्या जांच होता है?
क्योंकि लेक्टोज़ इनटोलरेंस अधिकतर लोगों में पाया जाता है, इसको साधारणतः बीमारी नहीं माना जाता है। इसीलिये, इसका जांच नहीं किया जाता है। वैसे जरूरत पड़ने पर इसके लिये जांच किया जा सकता है।
लेक्टोज़ इनटोलरेंस के अलावा क्या हो सकता है?
लेक्टोज़ इनटोलरेंस के समान लक्षण वाला रोग है दूध के प्रोटीन से एलर्जी। एलर्जी अधिक खतरनाक होता है, और पैखाने में खून भी आ सकता है। इसके लिये स्पेशलिस्ट डाक्टर से जांच करायें। इसके अलावा, उपर लिखे हुये अन्य बीमारी भी लेक्टोज़ इनटोलरेंस दे सकता है।
लेक्टोज़ इनटोलरेंस के लिये डाक्टर के पास कब जाना चाहिये?
क्योंकि लेक्टोज़ इनटोलरेंस विभिन्न बीमारी में पाया जाता है, इसके लिये आपको डाक्टर के पास जरूर जाना चाहिये कि कोई अन्य बीमारी तो नहीं है?
लेक्टोज़ इनटोलरेंस में दूध कम पीने से क्या होगा?
सबसे प्रमुख, शरीर को केलसियम (calcium) मिलना बंद हो जायेगा। इसके अलावा, दूध से अन्य चीज मिलना बंद हो जायेगा।
अन्य किन खाना से लेक्टोज़ मिल सकता है?
लेक्टोज़ एक तरह का चीनी है। यह दूध के अलावा, अनेक प्रकार का खाना और दवा में हो सकता है। उदाहरण के लिये – ब्रेड, कोर्नफ्लेक्स, पोटाटो चिप्स, और अन्य पैकेट फुड में।
लेक्टोज़ इनटोलरेंस में किस प्रकार का दूध पदार्थ खा सकते हैं?
जिन लोग को लेक्टोज़ इनटोलरेंस है, वो कम मात्रा में नीचे लिखे चीज खा सकते हैं।
दही
छाछ या मट्ठा या मक्खन निकाला हुआ दूध (buttermilk)
पुराना चीज़ (aged cheese)
सोयाबीन का दूध, अगर आपको सोयाबीन से कोई एलर्जी नहीं है
जिस पदार्थ में लेक्टोज़ नहीं हो
आईसक्रीम
मिल्कशेक
बकरी का दूध
लेक्टोज़ इनटोलरेंस में और क्या कर सकते हैं, कि कोई तकलीफ न हो?
आप दूध अगर लेना चाहें, तो कम कम करके, जैसे कि एक चौथाई से आधा कप तक, अधिक बार लें।
दूध खाने के साथ लें।
लेक्टोज़ रहित खाद्य प्दार्थ लें
उपर बताय गये दूध के बदले अन्य प्दार्थ लें
अन्य तरह के खाना और दवा में, लेक्टोज़ के तरफ ध्यान दें
अन्य तरह से केलसियम लें, जैसे कि बदाम, हरी सब्जी, मछली, पनीर, सोया, और केलसियम के दवा
लेक्टेज़ एंज़ाईम का दवा ले सकते हैं
और अन्य दवा जो कि पेट दर्द या दस्त के लिये ले सकते हैं
दस्त के लिये नमक-पानी का घोल या ओ आर एस के घोल के बारे में जानें
अपने अन्य बीमारी, जैसे कि कोई पेट का इंफेक्शन या अंतरी का बीमारी
का इलाज करायें