रविवार, 7 फ़रवरी 2010
ताली पीटकर भगाएँ रोगों को
पिछले करीब 5 सालों से हर दिन नहाने के बाद 15 मिनट ताली बजाता हूँ। मेरा अनुभव रहा है कि बेहद खराब जीवन शैली व रोगों के घर मोटापे के बावजूद केवल इस आदत ने अब तक मेरी रक्षा की है। ताली बजाने के फायदे पर मेरा भरोसा इस कदर बढ़ा है कि कोई पेट या सिर में होने वाली किसी भी परेशानी के लिए अच्छे डॉक्टर की सलाह माँगता है तो मैं पहले ताली की महिमा का बखान करने लग जाता हूँ। जिन लोगों ने मेरी यह सलाह मानी वे सभी मेरे शुक्रगुजार हैं ।
पिछले महीने की एक घटना के बाद लगा कि मुझे अपना यह अनुभव विशाल पाठक वर्ग से भी बाँटना चाहिए। खबरों की टोह लेने कुछ लंबे छरहरे स्वास्थ्य रिपोर्टरों के साथ शास्त्री भवन में था। वहाँ खुली सस्ती जेनेरिक दवा की सरकारी दुकान में घुस गया। वहाँ कक्ष में बैठे एमबीबीएस डॉक्टर से हम सब ने अपना ब्लड-प्रेशर नपवाया। मेरे ब्लड-प्रेशर की 120/80 रीडिंग देख कर उन्हें सहज यकीन ही नहीं आया।
50 से अधिक उम्र और इतनी बड़ी तोंद के बावजूद इतना 'आदर्श' ब्लड-प्रेशर, कैसे संभव है। दूसरे साथियों का ब्लड-प्रेशर भी सामान्य था लेकिन इतना सामान्य नहीं था। जब मैंने डॉक्टर को ताली बजाने की बात बताई तो उन्हें बात तुरंत समझ में आ गई। वे भी ताली के फायदे से अच्छी तरह वाकिफ थे। उन्होंने कहा कि नियमित ताली बजाने वाले को कम से कम ब्लड-प्रेशर की बीमारी तो नहीं हो सकती ।
लेकिन अगर अपने अनुभव की बात करूँ तो ताली बजाने के अनगिनत फायदे हैं। नियमित रूप से ताली बजा कर कीर्तन-भजन करने वालों पर 'भगवान' की कितनी कृपा होती है यह तो किसी को पता नहीं लेकिन मेरा विश्वास है कि निश्चित रूप से कई रोग उनके पास नहीं फटक पाते होंगे।
दक्षेस देशों के स्वास्थ्य पत्रकारों के संगठन 'हेल्थ एसेईस्ट एंड ऑथर्स लीग' (हील) के संस्थापक सेक्रेटरी जनरल की हैसियत से पत्रकारों के वर्कशॉप में मैं यही कहते हुए शुरू करता था कि इतनी बड़ी तोंद होते हुए मुझे स्वास्थ्य पर भाषण देने का हक नहीं है।
तोंद होना कई बीमारियों का घर माना जाता है लेकिन मैं अपने लंबे अनुभव के आधार पर अब स्वास्थ्य संपादक की हैसियत से यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि ताली बजाने के कई फायदे हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में लंबे अनुभव को इलाज की किसी विधि के प्रभावी होने के प्रमाण के रूप पेश किया जा सकता है ।
ताली बजाना इलाज की प्रभावी विधि एक्यूप्रेशर का एक सहजतम रूप है। कभी मुझे अक्सर डिप्रेशन (अवसाद) घेरे रहता था। सिर हमेशा भारी भारी, अक्सर दर्द, पेट में गैस, कभी भी कुछ हो जाने का डर सवार रहता था। केवल ताली बजाने मात्र से मेरी सारी समस्याएँ दूर हो गई हैं। आत्मविश्वास भी काफी बढ़ा है। लगता है, ताली बजाता रहूँ तो कभी कोई रोग होगा ही नहीं ।
ताली का इतना मुरीद इसलिए भी हूँ क्योंकि मेरी जीवन शैली अच्छे स्वास्थ्य के अनुरूप कतई नहीं है। रात को काफी देर से खाना खाता हूँ। टीवी देखने की इतनी बुरी आदत है कि नींद भाग जाती है। मुश्किल से 2-3 घंटे सो पाता हूँ। सुबह टहलने का तो सवाल ही नहीं। सोचिए, जीवन शैली ठीक होती तो ताली से और कितने फायदे हाते। ताली मुझे इस खराब जीवन शैली के दुष्प्रभाव से बचा रही है। ठीक से सो नहीं पाने की वजह से सुबह मन भारी जरूर लगता है लेकिन ताली बजाते ही इतना तरोताजा महसूस करने लगता हूँ कि मत पूछिए। सोचता हूँ कोई जादू तो नहीं हो गया ।
NDNDकहने का यह मतलब कतई नहीं है कि कोई गंभीर रोग है तो सबकुछ छोड़कर ताली पीटना शुरू कर दें। किडनी खराब हो गई है तो ताली पीटने से वह ठीक नहीं होने वाली। यह रोगों से बचाव में बहुत अधिक प्रभावी है लेकिन रोग हो गया है तो ताली उसकी दवा नहीं हो सकती। हाँ, इतना तय है कि इलाज के साथ-साथ ताली बजाएँ तो जल्दी फायदा जरूर होगा । मैं काँटेदार बेलन पर तलवे को 10 मिनट घिसता भी हूँ। यह भी एक्यूप्रेशर की ही विधि है ।
मेरा एक दूसरा अनुभव भी बाँटने योग्य है। सिर के बाल के तेजी से झड़ने को रोकने की कवायद में खासा परेशान था । सिर के बीच में चाँद निकल आया था। कई उपाय किए। बाल झड़ना बंद नहीं हुआ। लगा इस गति से तो जल्द ही सफाचट हो जाएगा। तभी किसी ने सरसों तेल आजमाने की सलाह दी।
तब से रोज नहाने के पहले पूरे माथे में चुपड़ लेता हूँ। फिर कुछ मिनट बाद तेल का प्रभाव खत्म करने के लिए शैंपू लगा लेता हूँ। मानें या न मानें, इस विधि के प्रयोग के बाद बाल का झड़ना जो रुका तो आज तक एक बाल भी बाँका नहीं हुआ है। इन सहज उपायों को देखकर तो आर्कमीडीज की तरह यूरेका (मिल गया) ! यूरेका ! कहने का मन होता है। कहीं यह कोई दवा तो नहीं !
पिछले महीने की एक घटना के बाद लगा कि मुझे अपना यह अनुभव विशाल पाठक वर्ग से भी बाँटना चाहिए। खबरों की टोह लेने कुछ लंबे छरहरे स्वास्थ्य रिपोर्टरों के साथ शास्त्री भवन में था। वहाँ खुली सस्ती जेनेरिक दवा की सरकारी दुकान में घुस गया। वहाँ कक्ष में बैठे एमबीबीएस डॉक्टर से हम सब ने अपना ब्लड-प्रेशर नपवाया। मेरे ब्लड-प्रेशर की 120/80 रीडिंग देख कर उन्हें सहज यकीन ही नहीं आया।
50 से अधिक उम्र और इतनी बड़ी तोंद के बावजूद इतना 'आदर्श' ब्लड-प्रेशर, कैसे संभव है। दूसरे साथियों का ब्लड-प्रेशर भी सामान्य था लेकिन इतना सामान्य नहीं था। जब मैंने डॉक्टर को ताली बजाने की बात बताई तो उन्हें बात तुरंत समझ में आ गई। वे भी ताली के फायदे से अच्छी तरह वाकिफ थे। उन्होंने कहा कि नियमित ताली बजाने वाले को कम से कम ब्लड-प्रेशर की बीमारी तो नहीं हो सकती ।
लेकिन अगर अपने अनुभव की बात करूँ तो ताली बजाने के अनगिनत फायदे हैं। नियमित रूप से ताली बजा कर कीर्तन-भजन करने वालों पर 'भगवान' की कितनी कृपा होती है यह तो किसी को पता नहीं लेकिन मेरा विश्वास है कि निश्चित रूप से कई रोग उनके पास नहीं फटक पाते होंगे।
दक्षेस देशों के स्वास्थ्य पत्रकारों के संगठन 'हेल्थ एसेईस्ट एंड ऑथर्स लीग' (हील) के संस्थापक सेक्रेटरी जनरल की हैसियत से पत्रकारों के वर्कशॉप में मैं यही कहते हुए शुरू करता था कि इतनी बड़ी तोंद होते हुए मुझे स्वास्थ्य पर भाषण देने का हक नहीं है।
तोंद होना कई बीमारियों का घर माना जाता है लेकिन मैं अपने लंबे अनुभव के आधार पर अब स्वास्थ्य संपादक की हैसियत से यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि ताली बजाने के कई फायदे हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में लंबे अनुभव को इलाज की किसी विधि के प्रभावी होने के प्रमाण के रूप पेश किया जा सकता है ।
ताली बजाना इलाज की प्रभावी विधि एक्यूप्रेशर का एक सहजतम रूप है। कभी मुझे अक्सर डिप्रेशन (अवसाद) घेरे रहता था। सिर हमेशा भारी भारी, अक्सर दर्द, पेट में गैस, कभी भी कुछ हो जाने का डर सवार रहता था। केवल ताली बजाने मात्र से मेरी सारी समस्याएँ दूर हो गई हैं। आत्मविश्वास भी काफी बढ़ा है। लगता है, ताली बजाता रहूँ तो कभी कोई रोग होगा ही नहीं ।
ताली का इतना मुरीद इसलिए भी हूँ क्योंकि मेरी जीवन शैली अच्छे स्वास्थ्य के अनुरूप कतई नहीं है। रात को काफी देर से खाना खाता हूँ। टीवी देखने की इतनी बुरी आदत है कि नींद भाग जाती है। मुश्किल से 2-3 घंटे सो पाता हूँ। सुबह टहलने का तो सवाल ही नहीं। सोचिए, जीवन शैली ठीक होती तो ताली से और कितने फायदे हाते। ताली मुझे इस खराब जीवन शैली के दुष्प्रभाव से बचा रही है। ठीक से सो नहीं पाने की वजह से सुबह मन भारी जरूर लगता है लेकिन ताली बजाते ही इतना तरोताजा महसूस करने लगता हूँ कि मत पूछिए। सोचता हूँ कोई जादू तो नहीं हो गया ।
NDNDकहने का यह मतलब कतई नहीं है कि कोई गंभीर रोग है तो सबकुछ छोड़कर ताली पीटना शुरू कर दें। किडनी खराब हो गई है तो ताली पीटने से वह ठीक नहीं होने वाली। यह रोगों से बचाव में बहुत अधिक प्रभावी है लेकिन रोग हो गया है तो ताली उसकी दवा नहीं हो सकती। हाँ, इतना तय है कि इलाज के साथ-साथ ताली बजाएँ तो जल्दी फायदा जरूर होगा । मैं काँटेदार बेलन पर तलवे को 10 मिनट घिसता भी हूँ। यह भी एक्यूप्रेशर की ही विधि है ।
मेरा एक दूसरा अनुभव भी बाँटने योग्य है। सिर के बाल के तेजी से झड़ने को रोकने की कवायद में खासा परेशान था । सिर के बीच में चाँद निकल आया था। कई उपाय किए। बाल झड़ना बंद नहीं हुआ। लगा इस गति से तो जल्द ही सफाचट हो जाएगा। तभी किसी ने सरसों तेल आजमाने की सलाह दी।
तब से रोज नहाने के पहले पूरे माथे में चुपड़ लेता हूँ। फिर कुछ मिनट बाद तेल का प्रभाव खत्म करने के लिए शैंपू लगा लेता हूँ। मानें या न मानें, इस विधि के प्रयोग के बाद बाल का झड़ना जो रुका तो आज तक एक बाल भी बाँका नहीं हुआ है। इन सहज उपायों को देखकर तो आर्कमीडीज की तरह यूरेका (मिल गया) ! यूरेका ! कहने का मन होता है। कहीं यह कोई दवा तो नहीं !
रंग चिकित्सा के गुणकारी प्रयोग

वैज्ञानिकों की मान्यता है कि विविध रंगों का मानव के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर बड़ा प्रभाव पड़ता है और प्रत्येक रंग के अपने विशेष आरोग्यकारक गुण होते है। रंग असंतुलन अर्थात रंगों की कमी या अधिकता के कारण मनुष्य के शरीर में कई प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
सामान्य रूप से देखने पर सूर्य का प्रकाश सफेद ही दिखाई देता है पर वास्तव में वह सात रंगों का मिश्रण होता है। काँच के त्रिपार्श्व से सूर्य की किरणों को गुजारने पर दूसरी ओर इन सात रंगों को स्पष्ट देखा जा सकता है।
किसी विशेष रंग की काँच की बोतल में साधारण पानी, चीनी, मिश्री, घी, ग्लिसरीन आदि तीन-चौथाई भरकर सूर्य की किरणें दिखाने से या धूप में रखने से उस काँच द्वारा सूर्य के प्रकाश से उसी रंग की किरणों को ग्रहण किया जाता है और उसी रंग का तत्व और गुण पानी आदि वस्तु में उत्पन्न हो जाता है और वह सूर्यतप्त (सूर्य किरणों द्वारा चार्ज की गई वस्तु) रोग-निवारण गुणों और स्वास्थ्यवर्धक तत्वों से युक्त हो जाती है।
इन सूर्यतापित वस्तुओं के उचित भीतरी और बाहरी प्रयोग से मनुष्य के शरीर में रंगों का संतुलन कायम रखा जा सकता है और अनेक प्रकार के रोगों को सहज ही दूर किया जा सकता है। यही सूर्य किरण चिकित्सा है।
सूर्य की किरणों में सर्वरोगनाशक अद्भुत शक्ति है, यह बात हमारे ऋषि-मनीषी हजारों साल पहले अच्छी तरह जानते थे, परन्तु आधुनिक युग में सूर्य किरण चिकित्सा और रंग-चिकित्सा का अनुसंधान और विकास कार्य विदेशों में हुआ। अब 'सूर्य-किरण-चिकित्सा' भारत में भी निरंतर लोकप्रिय होती जा रही है।
प्रस्तुतकर्ता Pushpa Bajaj पर ३:३० AM 0 टिप्पणियाँ
रंग चिकित्सा के गुणकारी प्रयोग
प्राणियों का संपूर्ण शरीर रंगीन है। शरीर के समस्त अवयवों का रंग अलग-अलग है। शरीर की समस्त कोशिकाएँ भी रंगीन हैं। शरीर का कोई अंग रुग्ण (बीमार) होता है तो उसके रासायनिक द्रव्यों के साथ-साथ रंगों का भी असंतुलन हो जाता है। रंग चिकित्सा उन रंगों को संतुलित कर देती है जिसके कारण रोग का निवारण हो जाता है।
शरीर में जहाँ भी विजातीय द्रव्य एकत्रित होकर रोग उत्पन्न करता है, रंग चिकित्सा उसे दबाती नहीं अपितु शरीर के बाहर निकाल देती है। प्रकृति का यह नियम है कि जो चिकित्सा जितनी स्वाभाविक होगी, उतनी ही प्रभावशाली भी होगी और उसकी प्रतिक्रिया भी न्यूनतम होगी।
सूर्य की रश्मियों में 7 रंग पाए जाते हैं-
1. लाल, 2. पीला, 3. नारंगी, 4. हरा, 5. नीला, 6.आसमानी, 7. बैंगनी
उपरोक्त रंगों के तीन समूह बनाए गए हैं -
1. लाल, पीला और नारंगी
2. हरा
3. नीला, आसमानी और बैंगनी
ND ND
प्रयोग की सरलता के लिए पहले समूह में से केवल नारंगी रंग का ही प्रयोग होता है। दूसरे में हरे रंग का और तीसरे समूह में से केवल नीले रंग का। अतः नारंगी, हरे और नीले रंग का उपयोग प्रत्येक रोग की चिकित्सा में किया जा सकता है।
नारंगी रंग की दवा के प्रयोग
कफजनित खाँसी, बुखार, निमोनिया आदि में लाभदायक। श्वास प्रकोप, क्षय रोग, एसिडीटी, फेफड़े संबंधी रोग, स्नायु दुर्बलता, हृदय रोग, गठिया, पक्षाघात (लकवा) आदि में गुणकारी है। पाचन तंत्र को ठीक रखती है। भूख बढ़ाती है। स्त्रियों के मासिक स्राव की कमी संबंधी कठिनाइयों को दूर करती है।
हरे रंग की दवा के प्रयोग
खासतौर पर चर्म रोग जैसे- चेचक, फोड़ा-फुंशी, दाद, खुजली आदि में गुणकारी साथ ही नेत्र रोगियों के लिए (दवा आँखों में डालना) मधुमेह, रक्तचाप सिरदर्द आदि में लाभदायक है।
नीले रंग की दवा के प्रयोग
शरीर में जलन होने पर, लू लगने पर, आंतरिक रक्तस्राव में आराम पहुँचाता है। तेज बुखार, सिरदर्द को कम करता है। नींद की कमी, उच्च रक्तचाप, हिस्टीरिया, मानसिक विक्षिप्तता में बहुत लाभदायक है। टांसिल, गले की बीमारियाँ, मसूड़े फूलना, दाँत दर्द, मुँह में छाले, पायरिया घाव आदि चर्म रोगों में अत्यंत प्रभावशाली है। डायरिया, डिसेन्टरी, वमन, जी मचलाना, हैजा आदि रोगों में आराम पहुँचाता है। जहरीले जीव-जंतु के काटने पर या फूड पॉयजनिंग में लाभ पहुँचाता है।
यह चिकित्सा जितनी सरल है उतनी ही कम खर्चीली भी है। संसार में जितनी प्रकार की चिकित्साएँ हैं, उनमें सबसे कम खर्च वाली चिकित्सा है।
दवाओं की निर्माण की विधि
जिस रंग की दवाएँ बनानी हों, उस रंग की काँच की बोतल लेकर शुद्ध पानी भरकर 8 घंटे धूप में रखने से दवा तैयार हो जाती है। बोतल थोड़ी खाली होनी चाहिए व ढक्कन बंद होना चाहिए। इस प्रकार बनी हुई दवा को चार या पाँच दिन सेवन कर सकते हैं। नारंगी रंग की दवा भोजन करने के बाद 15 से 30 मिनट के अंदर दी जानी चाहिए। हरे तथा नीले रंग की दवाएँ खाली पेट या भोजन से एक घंटा पहले दी जानी चाहिए। दवा की मात्रा- प्रत्येक रंग की दवा की साधारण खुराक 12 वर्ष से ऊपर की उम्र वाले व्यक्ति के लिए 2 औंस यानी 5 तोला होती है। कम आयु वाले बच्चों को कम मात्रा देनी चाहिए। आमतौर पर रोगी को एक दिन में तीन खुराक देना लाभदायक है।
सफेद बोतल के पानी पर किरणों का प्रभाव
सफेद बोतल में पीने का पानी 4-6 घंटे धूप में रखने से वह पानी कीटाणुमुक्त हो जाता है तथा कैल्शियमयुक्त हो जाता है। अगर बच्चों के दाँत निकलते समय वही पानी पिलाया जाए तो दाँत निकलने में आसानी होती है।
सामान्य रूप से देखने पर सूर्य का प्रकाश सफेद ही दिखाई देता है पर वास्तव में वह सात रंगों का मिश्रण होता है। काँच के त्रिपार्श्व से सूर्य की किरणों को गुजारने पर दूसरी ओर इन सात रंगों को स्पष्ट देखा जा सकता है।
किसी विशेष रंग की काँच की बोतल में साधारण पानी, चीनी, मिश्री, घी, ग्लिसरीन आदि तीन-चौथाई भरकर सूर्य की किरणें दिखाने से या धूप में रखने से उस काँच द्वारा सूर्य के प्रकाश से उसी रंग की किरणों को ग्रहण किया जाता है और उसी रंग का तत्व और गुण पानी आदि वस्तु में उत्पन्न हो जाता है और वह सूर्यतप्त (सूर्य किरणों द्वारा चार्ज की गई वस्तु) रोग-निवारण गुणों और स्वास्थ्यवर्धक तत्वों से युक्त हो जाती है।
इन सूर्यतापित वस्तुओं के उचित भीतरी और बाहरी प्रयोग से मनुष्य के शरीर में रंगों का संतुलन कायम रखा जा सकता है और अनेक प्रकार के रोगों को सहज ही दूर किया जा सकता है। यही सूर्य किरण चिकित्सा है।
सूर्य की किरणों में सर्वरोगनाशक अद्भुत शक्ति है, यह बात हमारे ऋषि-मनीषी हजारों साल पहले अच्छी तरह जानते थे, परन्तु आधुनिक युग में सूर्य किरण चिकित्सा और रंग-चिकित्सा का अनुसंधान और विकास कार्य विदेशों में हुआ। अब 'सूर्य-किरण-चिकित्सा' भारत में भी निरंतर लोकप्रिय होती जा रही है।
प्रस्तुतकर्ता Pushpa Bajaj पर ३:३० AM 0 टिप्पणियाँ
रंग चिकित्सा के गुणकारी प्रयोग
प्राणियों का संपूर्ण शरीर रंगीन है। शरीर के समस्त अवयवों का रंग अलग-अलग है। शरीर की समस्त कोशिकाएँ भी रंगीन हैं। शरीर का कोई अंग रुग्ण (बीमार) होता है तो उसके रासायनिक द्रव्यों के साथ-साथ रंगों का भी असंतुलन हो जाता है। रंग चिकित्सा उन रंगों को संतुलित कर देती है जिसके कारण रोग का निवारण हो जाता है।
शरीर में जहाँ भी विजातीय द्रव्य एकत्रित होकर रोग उत्पन्न करता है, रंग चिकित्सा उसे दबाती नहीं अपितु शरीर के बाहर निकाल देती है। प्रकृति का यह नियम है कि जो चिकित्सा जितनी स्वाभाविक होगी, उतनी ही प्रभावशाली भी होगी और उसकी प्रतिक्रिया भी न्यूनतम होगी।
सूर्य की रश्मियों में 7 रंग पाए जाते हैं-
1. लाल, 2. पीला, 3. नारंगी, 4. हरा, 5. नीला, 6.आसमानी, 7. बैंगनी
उपरोक्त रंगों के तीन समूह बनाए गए हैं -
1. लाल, पीला और नारंगी
2. हरा
3. नीला, आसमानी और बैंगनी
ND ND
प्रयोग की सरलता के लिए पहले समूह में से केवल नारंगी रंग का ही प्रयोग होता है। दूसरे में हरे रंग का और तीसरे समूह में से केवल नीले रंग का। अतः नारंगी, हरे और नीले रंग का उपयोग प्रत्येक रोग की चिकित्सा में किया जा सकता है।
नारंगी रंग की दवा के प्रयोग
कफजनित खाँसी, बुखार, निमोनिया आदि में लाभदायक। श्वास प्रकोप, क्षय रोग, एसिडीटी, फेफड़े संबंधी रोग, स्नायु दुर्बलता, हृदय रोग, गठिया, पक्षाघात (लकवा) आदि में गुणकारी है। पाचन तंत्र को ठीक रखती है। भूख बढ़ाती है। स्त्रियों के मासिक स्राव की कमी संबंधी कठिनाइयों को दूर करती है।
हरे रंग की दवा के प्रयोग
खासतौर पर चर्म रोग जैसे- चेचक, फोड़ा-फुंशी, दाद, खुजली आदि में गुणकारी साथ ही नेत्र रोगियों के लिए (दवा आँखों में डालना) मधुमेह, रक्तचाप सिरदर्द आदि में लाभदायक है।
नीले रंग की दवा के प्रयोग
शरीर में जलन होने पर, लू लगने पर, आंतरिक रक्तस्राव में आराम पहुँचाता है। तेज बुखार, सिरदर्द को कम करता है। नींद की कमी, उच्च रक्तचाप, हिस्टीरिया, मानसिक विक्षिप्तता में बहुत लाभदायक है। टांसिल, गले की बीमारियाँ, मसूड़े फूलना, दाँत दर्द, मुँह में छाले, पायरिया घाव आदि चर्म रोगों में अत्यंत प्रभावशाली है। डायरिया, डिसेन्टरी, वमन, जी मचलाना, हैजा आदि रोगों में आराम पहुँचाता है। जहरीले जीव-जंतु के काटने पर या फूड पॉयजनिंग में लाभ पहुँचाता है।
यह चिकित्सा जितनी सरल है उतनी ही कम खर्चीली भी है। संसार में जितनी प्रकार की चिकित्साएँ हैं, उनमें सबसे कम खर्च वाली चिकित्सा है।
दवाओं की निर्माण की विधि
जिस रंग की दवाएँ बनानी हों, उस रंग की काँच की बोतल लेकर शुद्ध पानी भरकर 8 घंटे धूप में रखने से दवा तैयार हो जाती है। बोतल थोड़ी खाली होनी चाहिए व ढक्कन बंद होना चाहिए। इस प्रकार बनी हुई दवा को चार या पाँच दिन सेवन कर सकते हैं। नारंगी रंग की दवा भोजन करने के बाद 15 से 30 मिनट के अंदर दी जानी चाहिए। हरे तथा नीले रंग की दवाएँ खाली पेट या भोजन से एक घंटा पहले दी जानी चाहिए। दवा की मात्रा- प्रत्येक रंग की दवा की साधारण खुराक 12 वर्ष से ऊपर की उम्र वाले व्यक्ति के लिए 2 औंस यानी 5 तोला होती है। कम आयु वाले बच्चों को कम मात्रा देनी चाहिए। आमतौर पर रोगी को एक दिन में तीन खुराक देना लाभदायक है।
सफेद बोतल के पानी पर किरणों का प्रभाव
सफेद बोतल में पीने का पानी 4-6 घंटे धूप में रखने से वह पानी कीटाणुमुक्त हो जाता है तथा कैल्शियमयुक्त हो जाता है। अगर बच्चों के दाँत निकलते समय वही पानी पिलाया जाए तो दाँत निकलने में आसानी होती है।
मालिश
शरीर के विकास के लिये अतिरिक्त कैलोरी की जरूरत होती है तेल कैलोरी का एक मुख्य व ठोस स्त्रोत है ।बच्चों को इसकी जरूरत करीब- करीब अठारह बीस साल की उम्र तक अधिक होती है इसके बाद अतिरिक्त तेल का जरूरत धीरे धीरे कम पडती जाती है और अगर फिर भी आप लगातार अधिक तेल इस्तेमाल करते रहे तो मोटापे के साथ-साथ और कई बीमारियों के शिकार हो सकते है ।कारण तेल में होने वाले कोलेस्ट्रॉल जो हमारे क् लिये नुकसाल दायकककक होता है ।ज्यादातर सभी तलों गी फूड़वैल्यू एक जैसी होती है ।तेल का मेडिकल नाम ट्रइग्लाइसराइडहैं ।तेल अपने में खुद बेस्वाद होता है परंतु सब्जियों में स्वाद उसमें डाले गये मसाले तथा नमक के कारण होता है ।
1. नीम का तेल- नीम के कड़वा होने के बावजूद भी उसमें अनेक गुण हैं। इसका तेल चर्म रोगों में लाभदायक है। कारण यह जीवाणुओं का नाश करता है। नीम के निंबोली का तेल गर्भ निरोधक के रूप में काम आता है। पायरिया रोग में इस तेल की कुछ बूंदें टूथ पेस्ट में डाल कर ब्रश करें। मुंह की बदबू खत्म होगी। मसूड़ों के रोग नष्ट होंगे। इसका तेल बाजार में उपलब्ध है।
2. जैतून का तेल- जैतून का तेल कोई साधारण तेल नहीं है। इसकी मालिश से शरीर काफी आराम मिलता है। यहां तक कि लकवा जैसे रोगों तक को ठीक करने की क्षमता रखता है। इससे अगर आप महिलाएं अपने स्तन के नीचे से ऊपर की ओर मालिश करें, तो स्तन पुष्ट होते हैं। सर्दी के मौसम में इस तेल से शरीर की मालिश करें, तो ठंड का एहसास नहीं होता। इससे चेहरे की मालिश भी कर सकते हैं। चेहरे की सुंदरता एवं कोमलता बनाये रखेगा। यह सूखी त्वचा के लिए उपयोगी है।
3. तिल का तेल- तिल विटामिन ए व ई से भरपूर होता है। इस कारण इसका तेल भी इतना ही महत्व रखता है। इसे हल्का गरम कर त्वचा पर मालिश करने से निखार आता है। अगर बालों में लगाते हैं, तो बालों में निखार आता है, लंबे होते हैं।
जोड़ों का दर्द हो, तो तिल के तेल में थोड़ी सी सोंठ पावडर, एक चुटकी हींग पावडर डाल कर गर्म कर मालिश करें। तिल का तेल खाने में भी उतना ही पौष्टिक है विशेषकर पुरुषों के लिए।
4. अलसी का तेल- जिस तरह अलसी तमाम औषधीय गुणों से भरपूर है, उसी तरह इसका तेल भी महत्व रखता है। अगर त्वचा जल जाये, तो अलसी का तेल लगाने से दर्द व जलन से राहत मिलती है। इसमें विटामिन ई होता है। इसका कुष्ठ रोगियों को सेवन करना चाहिए। त्वचा पर लाभ होगा।
5. अरण्ड का तेल- इस तेल से सिर पर मालिश करने पर ठंडा महसूस होता है। बालों की जड़ों को मुलायम बनाता है। अरण्ड का तेल दो चम्मच दूध में डालकर अगर सेवन करते हैं, तो कब्ज की शिकायत दूर होती है। पेट की किसी भी तकलीफ में अरण्ड का तेल दवा जैसा काम करता है। शरीर पर लगाने से त्वचा का रंग साफ होता है। इसके सेवन से स्मरण शक्ति भी बढ़ती है।
6. मूंगफली का तेल- जिस तरह मूंगफली पौष्टिक होती है। उसी तरह उसका तेल भी लाभदायक होता है, पचने में हल्का। इसके सेवन से प्रोटीन मिलता है। रक्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को कंट्रोल करता है। इसलिए हृदय रोगी इसका सेवन कर सकते हैं। इसके सेवन से जोड़ों के दर्द में लाभ होता है। इसके मालिश से चर्म रोगों में आराम मिलता है।
7. सरसों का तेल- सरसों का तेल मालिश करने पर शरीर के रक्त संचार को बढ़ाता है। थकान दूर करता है। नवजात शिशु एवं प्रसूता की मालिश इसी तेल से करनी चाहिए। सर्दियों में इस तेल की मालिश लाभदायक है। सरसों के तेल को पैर के तलुओं में सुखाने से थकान तुरंत मिटती है तथा नेत्रज्योति बढ़ती है। दाद, खाज, खुजली जैसे चर्म रोग से निजात पायी जा सकती है। चर्म रोग पर सरसों का तेल, आक का तेल, हल्दी डाल कर गर्म करें। ठंडा हो जाने पर लगायें। सरसों का तेल गुनगुना कर पिंडलियों पर लगायें, दर्द ठीक हो जायेगा। गठिया पर सरसों के तेल से मालिश करने पर आराम मिलता है।
सरसों का तेल नियमित रूप से बालों पर लगाते रहने से बाल समय से पहले सफेद नहीं होते। सरसों के तेल में सेंधा नमक डाल कर मसूड़ों की मालिश करें। पायरिया ठीक होगा। मसूड़ों से खून आना बंद होगा। बच्चों या बड़ों को जुकाम हो जाये, तो तेल में लहसुन पका कर तेल वापस थोड़ा ठंडा होने पर सीने पर मालिश करें। सर्दी-जुकाम ठीक हो जाता है।
8. राई का तेल- राई का तेल निमोनिया रोग से बचाव करता है। इस तेल की हल्की-हल्की मालिश कर के गुनगुनी धूप लें। इस तरह नियमित रूप से करने पर निमोनिया में फायदा होता है।
9. नारियल का तेल- नारियल के तेल में कपूर मिला कर यदि त्वचा पर लगायें, तो दाद, खाज, खुजली की शिकायत दूर होती है। यदि त्वचा जल जाये, तो तुरंत नारियल का तेल उस पर लगायें, निशान नहीं पड़ेगा। उस पर कुछ दिनों तक लगाते रहें। यह तेल बालों के लिए भी बेहतर होता है।
10. आंवले का तेल- इसमें विटामिन सी और आयरन होता है, जो बालों के लिए पोषक है। बालों के लिए आंवले का तेल बहुत अच्छा है।
1. नीम का तेल- नीम के कड़वा होने के बावजूद भी उसमें अनेक गुण हैं। इसका तेल चर्म रोगों में लाभदायक है। कारण यह जीवाणुओं का नाश करता है। नीम के निंबोली का तेल गर्भ निरोधक के रूप में काम आता है। पायरिया रोग में इस तेल की कुछ बूंदें टूथ पेस्ट में डाल कर ब्रश करें। मुंह की बदबू खत्म होगी। मसूड़ों के रोग नष्ट होंगे। इसका तेल बाजार में उपलब्ध है।
2. जैतून का तेल- जैतून का तेल कोई साधारण तेल नहीं है। इसकी मालिश से शरीर काफी आराम मिलता है। यहां तक कि लकवा जैसे रोगों तक को ठीक करने की क्षमता रखता है। इससे अगर आप महिलाएं अपने स्तन के नीचे से ऊपर की ओर मालिश करें, तो स्तन पुष्ट होते हैं। सर्दी के मौसम में इस तेल से शरीर की मालिश करें, तो ठंड का एहसास नहीं होता। इससे चेहरे की मालिश भी कर सकते हैं। चेहरे की सुंदरता एवं कोमलता बनाये रखेगा। यह सूखी त्वचा के लिए उपयोगी है।
3. तिल का तेल- तिल विटामिन ए व ई से भरपूर होता है। इस कारण इसका तेल भी इतना ही महत्व रखता है। इसे हल्का गरम कर त्वचा पर मालिश करने से निखार आता है। अगर बालों में लगाते हैं, तो बालों में निखार आता है, लंबे होते हैं।
जोड़ों का दर्द हो, तो तिल के तेल में थोड़ी सी सोंठ पावडर, एक चुटकी हींग पावडर डाल कर गर्म कर मालिश करें। तिल का तेल खाने में भी उतना ही पौष्टिक है विशेषकर पुरुषों के लिए।
4. अलसी का तेल- जिस तरह अलसी तमाम औषधीय गुणों से भरपूर है, उसी तरह इसका तेल भी महत्व रखता है। अगर त्वचा जल जाये, तो अलसी का तेल लगाने से दर्द व जलन से राहत मिलती है। इसमें विटामिन ई होता है। इसका कुष्ठ रोगियों को सेवन करना चाहिए। त्वचा पर लाभ होगा।
5. अरण्ड का तेल- इस तेल से सिर पर मालिश करने पर ठंडा महसूस होता है। बालों की जड़ों को मुलायम बनाता है। अरण्ड का तेल दो चम्मच दूध में डालकर अगर सेवन करते हैं, तो कब्ज की शिकायत दूर होती है। पेट की किसी भी तकलीफ में अरण्ड का तेल दवा जैसा काम करता है। शरीर पर लगाने से त्वचा का रंग साफ होता है। इसके सेवन से स्मरण शक्ति भी बढ़ती है।
6. मूंगफली का तेल- जिस तरह मूंगफली पौष्टिक होती है। उसी तरह उसका तेल भी लाभदायक होता है, पचने में हल्का। इसके सेवन से प्रोटीन मिलता है। रक्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को कंट्रोल करता है। इसलिए हृदय रोगी इसका सेवन कर सकते हैं। इसके सेवन से जोड़ों के दर्द में लाभ होता है। इसके मालिश से चर्म रोगों में आराम मिलता है।
7. सरसों का तेल- सरसों का तेल मालिश करने पर शरीर के रक्त संचार को बढ़ाता है। थकान दूर करता है। नवजात शिशु एवं प्रसूता की मालिश इसी तेल से करनी चाहिए। सर्दियों में इस तेल की मालिश लाभदायक है। सरसों के तेल को पैर के तलुओं में सुखाने से थकान तुरंत मिटती है तथा नेत्रज्योति बढ़ती है। दाद, खाज, खुजली जैसे चर्म रोग से निजात पायी जा सकती है। चर्म रोग पर सरसों का तेल, आक का तेल, हल्दी डाल कर गर्म करें। ठंडा हो जाने पर लगायें। सरसों का तेल गुनगुना कर पिंडलियों पर लगायें, दर्द ठीक हो जायेगा। गठिया पर सरसों के तेल से मालिश करने पर आराम मिलता है।
सरसों का तेल नियमित रूप से बालों पर लगाते रहने से बाल समय से पहले सफेद नहीं होते। सरसों के तेल में सेंधा नमक डाल कर मसूड़ों की मालिश करें। पायरिया ठीक होगा। मसूड़ों से खून आना बंद होगा। बच्चों या बड़ों को जुकाम हो जाये, तो तेल में लहसुन पका कर तेल वापस थोड़ा ठंडा होने पर सीने पर मालिश करें। सर्दी-जुकाम ठीक हो जाता है।
8. राई का तेल- राई का तेल निमोनिया रोग से बचाव करता है। इस तेल की हल्की-हल्की मालिश कर के गुनगुनी धूप लें। इस तरह नियमित रूप से करने पर निमोनिया में फायदा होता है।
9. नारियल का तेल- नारियल के तेल में कपूर मिला कर यदि त्वचा पर लगायें, तो दाद, खाज, खुजली की शिकायत दूर होती है। यदि त्वचा जल जाये, तो तुरंत नारियल का तेल उस पर लगायें, निशान नहीं पड़ेगा। उस पर कुछ दिनों तक लगाते रहें। यह तेल बालों के लिए भी बेहतर होता है।
10. आंवले का तेल- इसमें विटामिन सी और आयरन होता है, जो बालों के लिए पोषक है। बालों के लिए आंवले का तेल बहुत अच्छा है।
मंगलवार, 18 अगस्त 2009
Kichen Tips
१.सख्त नींबू को अगर गरम पानी में कुछ देर के लिए रख दिया जाये तो उसमें से आसानी से अधिक रस निकाला जा सकता है।
२.महीने में एक बार मिक्सर और ग्राइंडर में नमक डालकर चला दिया जाये तो उसके ब्लेड तेज हो जाते हैं।
३.नूडल्स उबालने के बाद अगर उसमें ठंडा पानी डाल दिया जाये तो वह आपस में चिपकेंगे नही।
४.पनीर को ब्लोटिंग पेपर में लपेटकर फ्रिज में रखने से यह अधिक देर तक ताजा रहेगा।
५.मेथी की कड़वाहट हटाने के लिये थोड़ा सा नमक डालकर उसे थोड़ी देर के लिये अलग रख दें।
६.एक टीस्पून शक्कर को भूरा होने तक गरम करे। केक के मिश्रण में इस शक्कर को मिला दे। ऐसा करने पर केक का रंग अच्छा आयेगा।
७.फूलगोभी पकाने पर उसका रंग चला जाता है। ऐसा न हो इसके लिए फूलगोभी की सब्जी में एक टीस्पून दूध अथवा सिरका डाले। आप देखेगी कि फूलगोभी का वास्तविक रंग बरकरार है।
८.आलू के पराठे बनाते समय आलू के मिश्रण में थोड़ी सी कसूरी मेथी डालना न भूले। पराठे इतने स्वादिष्ट होंगे कि हर कोई ज्यादा खाना चाहेगा।
९.आटा गूंधते समय पानी के साथ थोड़ा सा दूध मिलाये। इससे रोटी और पराठे का स्वाद बदल जाएगा।
१०.दाल पकाते समय एक चुटकी पिसी हल्दी और मूंगफली के तेल की कुछ बूंदे डाले। इससे दाल जल्दी पक जायेगी और उसका स्वाद भी बेहतर होगा।
११.बादाम को अगर 15-20 मिनट के लिए गरम पानी में भिगो दें तो उसका छिलका आसानी से उतर जायेगा।
१२.चीनी के डिब्बे में 5-6 लौंग डाल दी जाये तो उसमें चींटिया नही आयेगी।
१३.बिस्कुट के डिब्बे में नीचे ब्लोटिंग पेपर बिछाकर अगर बिस्कुट रखे जाये तो वह जल्दी खराब नही होंगे।
१४.कटे हुए सेब पर नींबू का रस लगाने से सेब काला नही पड़ेगा।
१५.जली हुए त्वचा पर मैश किया हुआ केला लगाने से ठंडक मिलती है।
१६.मिर्च के डिब्बे में थोड़ी सी हींग डालने से मिर्च लम्बे समय तक खराब नही होती।
१७.किचन के कोनो में बोरिक पाउडर छिड़कने से कॉकरोच नही आयेंगे।
१८.लहसुन के छिलके को हल्का सा गरम करने से वो आसानी से उतर जाते हैं।
१९.हरी मिर्च के डंठल को तोड़कर मिर्च को अगर फ्रिज में रखा जाये तो मिर्च जल्दी खराब नही होती।
२०.हरी मटर को अधिक समय तक ताजा रखने के लिए प्लास्टिक की थैली में डालकर फ्रिजर में रख दें।
आनन्द लें इन टिप्स का और मुझे ज़रूर याद रखें ।
२.महीने में एक बार मिक्सर और ग्राइंडर में नमक डालकर चला दिया जाये तो उसके ब्लेड तेज हो जाते हैं।
३.नूडल्स उबालने के बाद अगर उसमें ठंडा पानी डाल दिया जाये तो वह आपस में चिपकेंगे नही।
४.पनीर को ब्लोटिंग पेपर में लपेटकर फ्रिज में रखने से यह अधिक देर तक ताजा रहेगा।
५.मेथी की कड़वाहट हटाने के लिये थोड़ा सा नमक डालकर उसे थोड़ी देर के लिये अलग रख दें।
६.एक टीस्पून शक्कर को भूरा होने तक गरम करे। केक के मिश्रण में इस शक्कर को मिला दे। ऐसा करने पर केक का रंग अच्छा आयेगा।
७.फूलगोभी पकाने पर उसका रंग चला जाता है। ऐसा न हो इसके लिए फूलगोभी की सब्जी में एक टीस्पून दूध अथवा सिरका डाले। आप देखेगी कि फूलगोभी का वास्तविक रंग बरकरार है।
८.आलू के पराठे बनाते समय आलू के मिश्रण में थोड़ी सी कसूरी मेथी डालना न भूले। पराठे इतने स्वादिष्ट होंगे कि हर कोई ज्यादा खाना चाहेगा।
९.आटा गूंधते समय पानी के साथ थोड़ा सा दूध मिलाये। इससे रोटी और पराठे का स्वाद बदल जाएगा।
१०.दाल पकाते समय एक चुटकी पिसी हल्दी और मूंगफली के तेल की कुछ बूंदे डाले। इससे दाल जल्दी पक जायेगी और उसका स्वाद भी बेहतर होगा।
११.बादाम को अगर 15-20 मिनट के लिए गरम पानी में भिगो दें तो उसका छिलका आसानी से उतर जायेगा।
१२.चीनी के डिब्बे में 5-6 लौंग डाल दी जाये तो उसमें चींटिया नही आयेगी।
१३.बिस्कुट के डिब्बे में नीचे ब्लोटिंग पेपर बिछाकर अगर बिस्कुट रखे जाये तो वह जल्दी खराब नही होंगे।
१४.कटे हुए सेब पर नींबू का रस लगाने से सेब काला नही पड़ेगा।
१५.जली हुए त्वचा पर मैश किया हुआ केला लगाने से ठंडक मिलती है।
१६.मिर्च के डिब्बे में थोड़ी सी हींग डालने से मिर्च लम्बे समय तक खराब नही होती।
१७.किचन के कोनो में बोरिक पाउडर छिड़कने से कॉकरोच नही आयेंगे।
१८.लहसुन के छिलके को हल्का सा गरम करने से वो आसानी से उतर जाते हैं।
१९.हरी मिर्च के डंठल को तोड़कर मिर्च को अगर फ्रिज में रखा जाये तो मिर्च जल्दी खराब नही होती।
२०.हरी मटर को अधिक समय तक ताजा रखने के लिए प्लास्टिक की थैली में डालकर फ्रिजर में रख दें।
आनन्द लें इन टिप्स का और मुझे ज़रूर याद रखें ।
बादाम
1. बादाम क्या होता है?
बादाम एक तरह का मेवा होता है। यह सबसे गुणवान मेवा में से है, और रोजाना इसको खाना चाहिये। आयुर्वेद में इसको बुद्धि और नसों के लिये गुणकारी बताया गया है। भारत में यह कशमीर का राज्य पेड़ माना जाता है।
2. बादाम में क्या होता है?
बादाम से अनेक चीज प्राप्त होता है। यहां उसके बारे में बताया गया है।
23 बादाम = 1 मुठ्ठी बादाम = 1 आउंस बादाम = 28 ग्राम बादाम से मिलता है
कैलोरीज़ (calories) = 160, यह आपके शरीर को उर्जा प्रादान करता है। लेकिन बहुत अधिक खाने पर मोटापा भी दे सकता है।
¾ कैलोरीज इसमें फेट से मिलता है।
बाकिं कैलोरीज़, आपको कार्बोहाईड्रेट और प्रोटीन से मिलता है।
ग्लाईसेमिक लोड = 0 प्रतिदिन
कार्बोहाईड्रेट (Carbohydrate) बहुत कम होता है। इस कारण से बादाम से बना केक या बिस्कुट, वो लोग खा सकते हैं, जिन्हें चीनी खाना मना है, जैसे कि डायबिटीज़ के मरीज़।
प्रोटीन (Protein), यह शरीर में सार्वजनिक रूप से काम में आता है। यह आपके पेट को अधिक देर तक भर कर रखता है।
इसमें फेट इस प्रकार से है -
मोनो-अनसचुरेटेड फेटी असिड (Mono-unsaturated fatty acid) और पोली-अनसचुरेटेड फेटी असिड (Poly-unsaturated fatty acid), यह अच्छे तरह के चर्बी हैं, जो कि आपके शरीर में कोलेस्टेरोल को कम करता है और दिल के बीमारी को भी दूर भगाता है।
ओमेगा – 3 (omega 3) फेटी एसिड अधिक होता है, जो कि लाभकारी होता है।
इसमें सचुरेटेड फेटी असिड (Saturated fatty acid) बहुत कम होता है। यह आपके दिल के लाभदायक है।
कोलेस्टेरोल नहीं होता है। यह आपके दिल के लाभदायक है।
फाईबर या रेशा (Fibre), यह आपके पाचन में सहायता करता है। साथ ही दिल के बीमारी को भी दूर भगाता है। यह आपके पेट को अधिक देर तक भर कर रखता है। इससे इसको वो लोग खा सकते हैं, जिन्हें कब्जियत (Constipation) का शिकायत रहता है।
सोडियम (Sodium) नहीं होता है, अर्थात इसको वो लोग खा सकते हैं, जिन्हें नमक खाना मना है, जैसे कि उच्च रक्तचाप (High blood pressure) के मरीज़।
पोटाशियम (Potassium), यह आपके शरीर के सेल (cell) को काम करने में सहायता करता है।
विटामिन ई (Vitamin E), यह आपके शरीर के सेल (cell) को सुरक्षा पहुंचाता है।
आयरन (Iron), यह आपके खून बनाने में सहायता करता है।
मेगनेसियम (Magnesium), यह आपके हड्डीयों को मजबूत बनाता है।
केलशियम (Calcium), यह आपके हड्डीयों को मजबूत बनाता है।
फोसफोरस (Phosphorus), यह आपके हड्डीयों को मजबूत बनाता है।
अल्कोहोल या मदिरा (alcohol), इसमें नहीं होता है। इस कारण से बच्चे भी इसको खा सकते हैं।
कैफीन या कोफी (caffeine, coffee), इसमें नहीं होता है। इस कारण से बच्चे भी इसको खा सकते हैं।
३ बादाम हर दिन खाना चाहिये। इसको आप अंदाज से नाप सकते हैं, जैसे कि -
1 मुठ्ठी
1 चौथाई कप
22 से 24 गिनती में
5. बादाम हलवा
४ क्या रोज बादाम खाने से मोटापा होता है?
नहीं, अनेक रिसर्च से यह पता चला है कि, हर दिन उपर बताये गये संख्या में बादाम खाने से मोटापा नहीं होता है। साथ ही आप इस गुणकारी वस्तु को खाकर, आप अन्य चीज कम खाते हैं। यह आपके शरीर में अच्छे कोलेस्टेरोल को बढ़ाता है, और बुरे कोलेस्टेरोल को कम करता है।
5बादाम से क्या कोई बीमारी हो सकता है?
कच्चे बादाम खाने से टायफोयड हो सकता है। इस लिये हमेशा भुना हुआ, नमक के साथ या नमक के बिना, खाना चाहिये।
६ . बादाम के तेल का क्या इस्तेमाल होता है?
बादाम का तेल, मालिश के लिये इस्तेमाल किया जाता है।
बादाम एक तरह का मेवा होता है। यह सबसे गुणवान मेवा में से है, और रोजाना इसको खाना चाहिये। आयुर्वेद में इसको बुद्धि और नसों के लिये गुणकारी बताया गया है। भारत में यह कशमीर का राज्य पेड़ माना जाता है।
2. बादाम में क्या होता है?
बादाम से अनेक चीज प्राप्त होता है। यहां उसके बारे में बताया गया है।
23 बादाम = 1 मुठ्ठी बादाम = 1 आउंस बादाम = 28 ग्राम बादाम से मिलता है
कैलोरीज़ (calories) = 160, यह आपके शरीर को उर्जा प्रादान करता है। लेकिन बहुत अधिक खाने पर मोटापा भी दे सकता है।
¾ कैलोरीज इसमें फेट से मिलता है।
बाकिं कैलोरीज़, आपको कार्बोहाईड्रेट और प्रोटीन से मिलता है।
ग्लाईसेमिक लोड = 0 प्रतिदिन
कार्बोहाईड्रेट (Carbohydrate) बहुत कम होता है। इस कारण से बादाम से बना केक या बिस्कुट, वो लोग खा सकते हैं, जिन्हें चीनी खाना मना है, जैसे कि डायबिटीज़ के मरीज़।
प्रोटीन (Protein), यह शरीर में सार्वजनिक रूप से काम में आता है। यह आपके पेट को अधिक देर तक भर कर रखता है।
इसमें फेट इस प्रकार से है -
मोनो-अनसचुरेटेड फेटी असिड (Mono-unsaturated fatty acid) और पोली-अनसचुरेटेड फेटी असिड (Poly-unsaturated fatty acid), यह अच्छे तरह के चर्बी हैं, जो कि आपके शरीर में कोलेस्टेरोल को कम करता है और दिल के बीमारी को भी दूर भगाता है।
ओमेगा – 3 (omega 3) फेटी एसिड अधिक होता है, जो कि लाभकारी होता है।
इसमें सचुरेटेड फेटी असिड (Saturated fatty acid) बहुत कम होता है। यह आपके दिल के लाभदायक है।
कोलेस्टेरोल नहीं होता है। यह आपके दिल के लाभदायक है।
फाईबर या रेशा (Fibre), यह आपके पाचन में सहायता करता है। साथ ही दिल के बीमारी को भी दूर भगाता है। यह आपके पेट को अधिक देर तक भर कर रखता है। इससे इसको वो लोग खा सकते हैं, जिन्हें कब्जियत (Constipation) का शिकायत रहता है।
सोडियम (Sodium) नहीं होता है, अर्थात इसको वो लोग खा सकते हैं, जिन्हें नमक खाना मना है, जैसे कि उच्च रक्तचाप (High blood pressure) के मरीज़।
पोटाशियम (Potassium), यह आपके शरीर के सेल (cell) को काम करने में सहायता करता है।
विटामिन ई (Vitamin E), यह आपके शरीर के सेल (cell) को सुरक्षा पहुंचाता है।
आयरन (Iron), यह आपके खून बनाने में सहायता करता है।
मेगनेसियम (Magnesium), यह आपके हड्डीयों को मजबूत बनाता है।
केलशियम (Calcium), यह आपके हड्डीयों को मजबूत बनाता है।
फोसफोरस (Phosphorus), यह आपके हड्डीयों को मजबूत बनाता है।
अल्कोहोल या मदिरा (alcohol), इसमें नहीं होता है। इस कारण से बच्चे भी इसको खा सकते हैं।
कैफीन या कोफी (caffeine, coffee), इसमें नहीं होता है। इस कारण से बच्चे भी इसको खा सकते हैं।
३ बादाम हर दिन खाना चाहिये। इसको आप अंदाज से नाप सकते हैं, जैसे कि -
1 मुठ्ठी
1 चौथाई कप
22 से 24 गिनती में
5. बादाम हलवा
४ क्या रोज बादाम खाने से मोटापा होता है?
नहीं, अनेक रिसर्च से यह पता चला है कि, हर दिन उपर बताये गये संख्या में बादाम खाने से मोटापा नहीं होता है। साथ ही आप इस गुणकारी वस्तु को खाकर, आप अन्य चीज कम खाते हैं। यह आपके शरीर में अच्छे कोलेस्टेरोल को बढ़ाता है, और बुरे कोलेस्टेरोल को कम करता है।
5बादाम से क्या कोई बीमारी हो सकता है?
कच्चे बादाम खाने से टायफोयड हो सकता है। इस लिये हमेशा भुना हुआ, नमक के साथ या नमक के बिना, खाना चाहिये।
६ . बादाम के तेल का क्या इस्तेमाल होता है?
बादाम का तेल, मालिश के लिये इस्तेमाल किया जाता है।
लाईफस्टायल मोडिफिकेशन
1. “लाईफस्टायल मोडिफिकेशन” किसे कहते हैं?
दिल और नसों के बीमारीयों और अन्य बीमारीयों के होने के संभावना को कम करने के लिये अनेक उपाय हैं जो आप अपने जीवन में लागू कर सकते हैं। इसे “लाईफस्टायल मोडिफिकेशन” कहते हैं। इसमें आप जितना हो सके, अपने जीवन में आहिस्ता-आहिस्ता अपनाने का कोशिश करें। जितना अधिक आप इन बातों को अमल करेंगे, उतना कम आपको इन तरह के बीमारी होने का संभावना होगा।
अधिकतर समय हमारे समाज में यह होता है बचपन और जवानी को खाने-खेलने के लिये कहा गया है, और सामान्य रूप में खाने-खेलने के लिये को कोई रोक-टोक नहीं होता है। इसका मतलब है कि आप जितना चाहे, बटर लगा के परांठा, तले हुये और अधिक ग्रेवी वाले खाना, सोडा-कोल्ड-ड्रिंक्स, मिठाई, पिट्ज़ा, बरगर और अन्य अधिक कैलोरीज़ वाले खाना खाते हैं। उपर से आजकल के युग में, घर-बाहर में मोबाईल फोन और अनेक सुख-सुविधा होने से शारीरिक मेहनत कम हो गया है; बच्चे बाहर कम और कम्पुटर पर अधिक खेलते हैं; और सभी को अधिक स्ट्रेस रहता है। और उसके बाद पैंतीस-चालीस साल होते होते मोटापा, और पचासा होते होते हार्ट-अटैक और स्ट्रोक होने का जिक्र सुनने लगे हैं। फिर अचानक ही आपको यह चाहत होता है कि सबकुछ को “बटन” दबाकर “रिसेट” कर दें।
ये बातें केवल मरीजों के लिये नहीं है, बल्कि बचपन से सभी को इसका महत्व समझना चाहिये, और उस तरह का “लाईफस्टायल” अपनाना चाहिये। क्या जरूरत है कि पहले खिला-खिला कर मोटापा अर्जित करें, और फिर उसको लेकर ही हमेशा परेशान रहें? अधिक कैलोरीज़ वाले खाना, अपना दुर्प्रभाव बचपन से ही चालू कर देते हैं। दिल के नसों में तेल युक्त पदार्थ जमने लगते हैं, जिसे “प्लाक” कहते हैं, और यह आगे जाकर दिल का दौरा का कारण बन सकता है। भारत में पिछले दो दशक के विकास के कारण, बच्चों में मोटापा दिखने लगा है, क्योंकि बच्चों को अधिक कैलोरीज़ वाला खाना मिलता है, जिसे वो खेल-कूद कर खर्चा नहीं करते हैं। और इसी कारण से भारत में भी अब पश्चिमी देशों के जैसे बीमारी हर घर में दिखने लगा है।
2. “लाईफस्टायल मोडिफिकेशन” से किन बीमारीयों से बच सकते हैं?
“लाईफस्टायल मोडिफिकेशन” से आप अपने को अनेक बीमारी से बचा सकते हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि आपको कोई बीमारी नहीं होगा। किंतु इससे आपको अनेक तरह के बीमारी होने के का संभावना कम हो जायेगा। कुछ बीमारी जिनका खतरा कम हो सकता है, वो हैं -
दिल का दौरा या हार्ट अटैक (Heart attack)
खून के नसों का बीमारी जैसे डी वी टी (DVT)
दिमाग में खून फैलना या ब्रैन हैमोरहेज या स्ट्रोक (stroke)
उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure)
कोलेस्टेरोल संबंधित समस्या (cholesterol related problems)
मोटापा संबंधित समस्या (obesity related problems)
डायबिटीज़ (Diabetes)
अन्य संबंधित समस्या (other related problems)
3. “लाईफस्टायल मोडिफिकेशन” में क्या करना होता है?
इसमें, नीचे लिखे हुये सूची में से आप अनेक चीज कर सकते हैं। अधिक जानकारी के लिये संबंधित विषय देखें।
जरूरत से अधिक न खायें
खाना में तेल कम लें
खाना में चीनी कम लें
खाना में नमक कम लें
खाना में फाईबर अधिक लें
खाना में सब्जी अधिक लें
पौष्टिक खाना खायें
पार्याप्त विटामिन और मिनेरल्स खाया करें
रोजाना व्यायाम करें और अपने शरीर पर ध्यान दें
रोजाना शारीरिक मेहनत वाला काम करें
वजन को सामान्य स्तर में रखें, मोटापा खत्म करें
दिल और नसों के बीमारीयों और अन्य बीमारीयों के होने के संभावना को कम करने के लिये अनेक उपाय हैं जो आप अपने जीवन में लागू कर सकते हैं। इसे “लाईफस्टायल मोडिफिकेशन” कहते हैं। इसमें आप जितना हो सके, अपने जीवन में आहिस्ता-आहिस्ता अपनाने का कोशिश करें। जितना अधिक आप इन बातों को अमल करेंगे, उतना कम आपको इन तरह के बीमारी होने का संभावना होगा।
अधिकतर समय हमारे समाज में यह होता है बचपन और जवानी को खाने-खेलने के लिये कहा गया है, और सामान्य रूप में खाने-खेलने के लिये को कोई रोक-टोक नहीं होता है। इसका मतलब है कि आप जितना चाहे, बटर लगा के परांठा, तले हुये और अधिक ग्रेवी वाले खाना, सोडा-कोल्ड-ड्रिंक्स, मिठाई, पिट्ज़ा, बरगर और अन्य अधिक कैलोरीज़ वाले खाना खाते हैं। उपर से आजकल के युग में, घर-बाहर में मोबाईल फोन और अनेक सुख-सुविधा होने से शारीरिक मेहनत कम हो गया है; बच्चे बाहर कम और कम्पुटर पर अधिक खेलते हैं; और सभी को अधिक स्ट्रेस रहता है। और उसके बाद पैंतीस-चालीस साल होते होते मोटापा, और पचासा होते होते हार्ट-अटैक और स्ट्रोक होने का जिक्र सुनने लगे हैं। फिर अचानक ही आपको यह चाहत होता है कि सबकुछ को “बटन” दबाकर “रिसेट” कर दें।
ये बातें केवल मरीजों के लिये नहीं है, बल्कि बचपन से सभी को इसका महत्व समझना चाहिये, और उस तरह का “लाईफस्टायल” अपनाना चाहिये। क्या जरूरत है कि पहले खिला-खिला कर मोटापा अर्जित करें, और फिर उसको लेकर ही हमेशा परेशान रहें? अधिक कैलोरीज़ वाले खाना, अपना दुर्प्रभाव बचपन से ही चालू कर देते हैं। दिल के नसों में तेल युक्त पदार्थ जमने लगते हैं, जिसे “प्लाक” कहते हैं, और यह आगे जाकर दिल का दौरा का कारण बन सकता है। भारत में पिछले दो दशक के विकास के कारण, बच्चों में मोटापा दिखने लगा है, क्योंकि बच्चों को अधिक कैलोरीज़ वाला खाना मिलता है, जिसे वो खेल-कूद कर खर्चा नहीं करते हैं। और इसी कारण से भारत में भी अब पश्चिमी देशों के जैसे बीमारी हर घर में दिखने लगा है।
2. “लाईफस्टायल मोडिफिकेशन” से किन बीमारीयों से बच सकते हैं?
“लाईफस्टायल मोडिफिकेशन” से आप अपने को अनेक बीमारी से बचा सकते हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि आपको कोई बीमारी नहीं होगा। किंतु इससे आपको अनेक तरह के बीमारी होने के का संभावना कम हो जायेगा। कुछ बीमारी जिनका खतरा कम हो सकता है, वो हैं -
दिल का दौरा या हार्ट अटैक (Heart attack)
खून के नसों का बीमारी जैसे डी वी टी (DVT)
दिमाग में खून फैलना या ब्रैन हैमोरहेज या स्ट्रोक (stroke)
उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure)
कोलेस्टेरोल संबंधित समस्या (cholesterol related problems)
मोटापा संबंधित समस्या (obesity related problems)
डायबिटीज़ (Diabetes)
अन्य संबंधित समस्या (other related problems)
3. “लाईफस्टायल मोडिफिकेशन” में क्या करना होता है?
इसमें, नीचे लिखे हुये सूची में से आप अनेक चीज कर सकते हैं। अधिक जानकारी के लिये संबंधित विषय देखें।
जरूरत से अधिक न खायें
खाना में तेल कम लें
खाना में चीनी कम लें
खाना में नमक कम लें
खाना में फाईबर अधिक लें
खाना में सब्जी अधिक लें
पौष्टिक खाना खायें
पार्याप्त विटामिन और मिनेरल्स खाया करें
रोजाना व्यायाम करें और अपने शरीर पर ध्यान दें
रोजाना शारीरिक मेहनत वाला काम करें
वजन को सामान्य स्तर में रखें, मोटापा खत्म करें
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